सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से गंभीर हालत में जीवन जी रहे हरीश राणा को पैसिव इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जब किसी मरीज की हालत लंबे समय तक स्थिर रहे और इलाज से सुधार की कोई उम्मीद न हो, तब उसे कृत्रिम तरीकों से जिंदा रखना जरूरी नहीं है। कोर्ट ने डॉक्टरों की निगरानी में चरणबद्ध तरीके से मेडिकल सपोर्ट सिस्टम हटाने की इजाजत दी है। इस फैसले को जीवन और मृत्यु के बीच मानव गरिमा से जुड़े अहम सिद्धांतों के संदर्भ में देखा जा रहा है।
कॉलेज हादसे ने बदल दी जिंदगी
सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि हरीश राणा कभी एक प्रतिभाशाली युवक थे। कॉलेज के समय हुई एक गंभीर दुर्घटना में उनके मस्तिष्क को भारी नुकसान पहुंचा था। इसके बाद से वह गंभीर न्यूरोलॉजिकल स्थिति में हैं। मेडिकल रिपोर्ट में बताया गया कि पिछले 13 वर्षों में उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है। इसी आधार पर अदालत ने माना कि इलाज से फायदा मिलने की संभावना बेहद कम है और ऐसी स्थिति में कृत्रिम रूप से जीवन बनाए रखना उचित नहीं है।
2018 के फैसले का दिया गया हवाला
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला ने फैसले के दौरान कहा कि पैसिव इच्छामृत्यु को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले ही 2018 में ऐतिहासिक निर्णय दे चुका है। उस फैसले में जीवन, मृत्यु और मानव गरिमा के बीच संतुलन पर विस्तार से विचार किया गया था। अदालत ने अन्य देशों में लागू नियमों और मरीज के सर्वोच्च हित के सिद्धांतों का भी अध्ययन किया था। जस्टिस पारदीवाला ने यह भी बताया कि इस मामले में जस्टिस के.वी. विश्वनाथन ने भी अलग से फैसला लिखा है, हालांकि दोनों का निष्कर्ष एक जैसा ही है।
भविष्य के मामलों के लिए तय किए गए दिशा-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के साथ भविष्य में आने वाले पैसिव इच्छामृत्यु से जुड़े मामलों के लिए कुछ दिशा-निर्देश भी तय किए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मरीज का इलाज या मेडिकल सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया पूरी तरह मानवीय तरीके से डॉक्टरों की देखरेख में होनी चाहिए। यह जरूरी नहीं है कि यह प्रक्रिया केवल अस्पताल में ही की जाए, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार मरीज के घर पर भी यह संभव हो सकता है। अदालत का कहना है कि ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बात मरीज की गरिमा और उसके सर्वोच्च हित को ध्यान में रखना है।
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