अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में भारतीय मूल के नेताओं ने अपनी ताकत दिखाई है। पिया डंडिया, सुहास सुब्रमण्यम और अरुणा मिलर ने शानदार जीत दर्ज कर अमेरिकी राजनीति में भारतीय समुदाय की बढ़ती भूमिका को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। आखिर इन तीनों नेताओं की जीत के क्या मायने हैं और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह चुनाव किस तरह की चुनौती लेकर आया है?
भारतीय मूल के नेताओं ने अमेरिका में दिखाया दम
अमेरिका की राजनीति में भारतीय मूल के लोगों की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। मिडटर्म चुनाव के नतीजों में भी इसकी झलक देखने को मिली है। पिया डंडिया, सुहास सुब्रमण्यम और अरुणा मिलर की जीत ने भारतीय-अमेरिकी समुदाय का राजनीतिक प्रभाव फिर से सामने ला दिया है। इन नेताओं ने अलग-अलग राज्यों में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करते हुए मतदाताओं का भरोसा जीता है। खास बात यह है कि इनकी जीत केवल व्यक्तिगत राजनीतिक सफलता नहीं है, बल्कि अमेरिकी राजनीति में प्रवासी समुदायों की बढ़ती भागीदारी का भी संकेत देती है। भारतीय मूल के इन नेताओं ने अपने काम, स्थानीय मुद्दों और जनता से जुड़ाव के आधार पर चुनाव में सफलता हासिल की है। इससे अमेरिका में रहने वाले भारतीय समुदाय के बीच भी उत्साह का माहौल है।
पिया डंडिया ने फ्लोरिडा में दर्ज की जीत, पहली बार पहुंचेंगी कांग्रेस
फ्लोरिडा से चुनाव लड़ने वाली डेमोक्रेटिक पार्टी की नेता पिया डंडिया ने रिपब्लिकन उम्मीदवार और पूर्व मरीन सैनिक केसी अस्कार को शिकस्त दी। चुनावी आंकड़ों के मुताबिक, पिया को 51.9 प्रतिशत वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी को 49.1 प्रतिशत वोट मिलने की जानकारी दी गई। पिया के लिए यह जीत इसलिए भी खास है, क्योंकि इसके साथ ही उन्होंने अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में अपनी जगह बनाई है। उनके माता-पिता भारत से अमेरिका जाकर बस गए थे। राजनीति में आने से पहले पिया शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ी रही हैं। उन्होंने हाई स्कूल प्रिंसिपल के रूप में काम किया और कम आय वाले परिवारों के बच्चों को बेहतर भविष्य देने के उद्देश्य से एक स्कूल की स्थापना भी की। उनका मानना रहा है कि अच्छी शिक्षा युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने का मजबूत माध्यम है। यही मुद्दे उनके राजनीतिक सफर में भी अहम रहे हैं।
सुहास सुब्रमण्यम और अरुणा मिलर ने भी कायम रखा अपना दबदबा
भारतीय मूल के नेता सुहास सुब्रमण्यम ने वर्जीनिया के 10वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से दोबारा जीत हासिल की। करीब 40 वर्षीय सुहास को 61.5 प्रतिशत से अधिक वोट मिले, जबकि रिपब्लिकन उम्मीदवार डेव बेकविथ को लगभग 36.4 प्रतिशत वोट हासिल हुए। सुहास इससे पहले पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के सलाहकार के रूप में भी काम कर चुके हैं। सामाजिक कार्यों में उनकी सक्रियता भी चर्चा में रही है। दूसरी ओर, अरुणा मिलर ने मैरीलैंड की लेफ्टिनेंट गवर्नर के रूप में अपनी जीत दोहराई। उन्होंने डेमोक्रेटिक उम्मीदवार वेस मूर के साथ चुनाव लड़ा और रिपब्लिकन उम्मीदवार रॉब क्रोप को हराया। हैदराबाद में जन्मीं अरुणा का राजनीतिक सफर भारतीय मूल के लोगों के लिए प्रेरणा का उदाहरण माना जा रहा है। उनकी जीत से मैरीलैंड के प्रशासन में उनका एक और कार्यकाल तय हुआ है।
ट्रंप के लिए क्यों अहम हैं मिडटर्म चुनाव
अमेरिका में मिडटर्म चुनाव राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच में होते हैं। इन चुनावों में प्रतिनिधि सभा की सभी सीटों और सीनेट की करीब एक तिहाई सीटों के लिए मतदान होता है। इसके नतीजे यह तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं कि राष्ट्रपति की पार्टी संसद के दोनों सदनों में कितनी मजबूत स्थिति में है। डोनाल्ड ट्रंप के लिए ये चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनके जरिए उनकी सरकार की नीतियों, फैसलों और कामकाज को लेकर जनता का रुख सामने आता है। यदि विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी को बढ़त मिलती है तो राष्ट्रपति के लिए नए कानून पास कराना और अपनी योजनाओं को लागू करना मुश्किल हो सकता है। वहीं, रिपब्लिकन पार्टी की मजबूत स्थिति ट्रंप को नीतिगत फैसलों में अधिक समर्थन दे सकती है। भारतीय मूल के नेताओं की जीत इस राजनीतिक मुकाबले को एक और पहलू देती है। इससे साफ होता है कि अमेरिकी चुनावों में अब भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं और नेताओं की भूमिका को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
