बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ हिंसा का एक और दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है। राजधानी ढाका से करीब 140 किलोमीटर दूर स्थित एक गांव में हिंदू युवक दीपू दास को भीड़ ने बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला और बाद में उसके शव को आग के हवाले कर दिया। आरोप लगाया गया कि दीपू दास ने ईशनिंदा की है, लेकिन बाद में प्रशासन ने खुद स्वीकार किया कि इस आरोप के कोई ठोस सबूत नहीं मिले। बताया जा रहा है कि दीपू के एक सहकर्मी ने निजी रंजिश के चलते उस पर ईशनिंदा का झूठा आरोप लगाया था, जिसके बाद भीड़ उग्र हो गई। इस घटना ने न सिर्फ बांग्लादेश बल्कि भारत और अन्य देशों में भी आक्रोश पैदा कर दिया है। कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
घर में पसरा मातम और सन्नाटा
घटना के बाद टीम दीपू दास के गांव पहुंची और पीड़ित परिवार से बातचीत की। घर की हालत देखकर साफ था कि परिवार अभी भी सदमे से उबर नहीं पाया है। दीपू की पत्नी मेघना रानी घर के एक कोने में बिस्तर पर बेसुध पड़ी थीं। आंखें सूनी थीं और चेहरे पर ऐसा सन्नाटा, मानो शब्द भी उनका साथ छोड़ चुके हों। उनकी छोटी बेटी को अभी यह समझ भी नहीं है कि उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं रहे। दीपू के पिता भक्त रविदास, मां शेफाली रविदास और भाई अपू दास और रितिक दास उसी छोटे से घर में रहते हैं, जहां अब हर कोना बेटे की यादों से भरा है। परिवार का कहना है कि जिस तरीके से दीपू को भीड़ ने निशाना बनाया, उसने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया है।
परिवार ने जाहिर की नाराजगी
परिवार ने बांग्लादेश सरकार की ओर से दी गई शुरुआती मदद पर गहरी नाराजगी जताई। दीपू दास के परिजनों ने बताया कि प्रशासन ने उन्हें 25 हजार रुपये, कुछ चावल, एक कंबल और एक सिलाई मशीन दी। परिवार का कहना है कि यह मदद उनके बेटे की जान के सामने कुछ भी नहीं है। बाद में उन्हें 1 लाख रुपये का चेक भी दिया गया, लेकिन परिवार का दर्द कम नहीं हुआ। दीपू के पिता ने कहा, “हम गरीब लोग हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हमारे बेटे की जान की कीमत कुछ हजार रुपये लगा दी जाए। यह मदद नहीं, हमारे लिए अपमान जैसा है।” हालांकि परिवार को अब भी उम्मीद है कि सरकार आगे चलकर सही मुआवजा और न्याय देगी। उनका कहना है कि दोषियों को सख्त सजा मिलनी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी और परिवार को ऐसा दर्द न झेलना पड़े।
दुनिया भर के लोगों में आक्रोश
दीपू दास की हत्या का मामला अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन चुका है। भारत सहित कई देशों में मानवाधिकार संगठनों और सामाजिक समूहों ने इस घटना की निंदा की है। सवाल उठ रहा है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू कितने सुरक्षित हैं और क्या ईशनिंदा जैसे संवेदनशील आरोपों का गलत इस्तेमाल कर निर्दोष लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की घटनाएं समाज में डर का माहौल पैदा करती हैं और कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। दीपू दास का परिवार अब सिर्फ इंसाफ चाहता है — ऐसा इंसाफ जो उनके बेटे को तो वापस नहीं ला सकता, लेकिन भविष्य में किसी और दीपू की जान बचा सके।
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