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“यह कमान तब दी जाती…”, तेजस्वी यादव को आरजेडी का बड़ा पद मिलते ही क्यों आगबबूला हो गए चिराग पासवान?

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राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने रविवार 25 जनवरी 2026 को हुई अहम बैठक में बड़ा फैसला लिया। पार्टी ने तेजस्वी यादव को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया। इस फैसले के साथ ही बिहार की राजनीति में हलचल तेज हो गई। आरजेडी समर्थकों ने इसे पार्टी के भविष्य की दिशा तय करने वाला कदम बताया, जबकि विपक्षी दलों ने इस पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। तेजस्वी यादव पहले से ही पार्टी के प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा चुके हैं। पार्टी का मानना है कि नई जिम्मेदारी मिलने से संगठन को मजबूती मिलेगी और आगामी चुनावों में इसका सीधा असर दिखेगा। हालांकि, इस फैसले के तुरंत बाद एनडीए नेताओं की प्रतिक्रिया सामने आने लगी, जिसमें सबसे तीखा बयान केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान का रहा। उन्होंने इस नियुक्ति को समय और परिस्थितियों से जोड़ते हुए गंभीर सवाल खड़े किए।

“पहले हार की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए थी”

तेजस्वी यादव के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनने पर चिराग पासवान ने कहा कि यह फैसला आज नहीं तो कल होना ही था, लेकिन सवाल यह है कि क्या इसका समय सही है। उन्होंने कहा कि आरजेडी को हाल के चुनावों में ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा और अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया कि इस हार की जिम्मेदारी किसकी थी। चिराग पासवान के मुताबिक, जब पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा हो, तब नेतृत्व को लेकर आत्ममंथन जरूरी होता है। उन्होंने कहा कि अगर तेजस्वी यादव के नेतृत्व में पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन किया होता, तो उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिलना स्वाभाविक था। लेकिन हार के बाद सीधे बड़े पद से नवाजना कई सवाल खड़े करता है। उनका कहना था कि किसी भी राजनीतिक दल में जवाबदेही तय होना जरूरी है, ताकि कार्यकर्ताओं और समर्थकों में भरोसा बना रहे।

परिवारवाद का आरोप, कार्यकर्ताओं की अनदेखी का मुद्दा

चिराग पासवान ने आरजेडी पर परिवार तक सीमित रहने का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि एक तरफ पार्टी ऐतिहासिक हार के बाद अपनी जिम्मेदारियों से बचती नजर आती है, दूसरी तरफ उसी नेतृत्व को और बड़ा पद दे दिया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि हार के बाद तेजस्वी यादव ने मीडिया का सामना नहीं किया और न ही कार्यकर्ताओं से खुलकर संवाद किया। चिराग के मुताबिक, प्रदेश अध्यक्ष स्तर पर जवाब मांगा जाता है, लेकिन शीर्ष नेतृत्व पर कोई सवाल नहीं उठता, जिससे यह संदेश जाता है कि पार्टी कुछ खास लोगों तक ही सीमित है। उनका कहना था कि एक मजबूत पार्टी वही होती है, जहां हार-जीत दोनों की जिम्मेदारी समान रूप से ली जाए और कार्यकर्ताओं की आवाज सुनी जाए। इस बयान के बाद बिहार की राजनीति में परिवारवाद और संगठनात्मक लोकतंत्र को लेकर बहस और तेज हो गई है।

बिहार की पुरानी यादें और ‘बिहार फर्स्ट’ का दावा

पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए चिराग पासवान ने बिहार के पुराने दौर का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि 90 के दशक की परिस्थितियां आज भी लोगों को याद हैं, जब बड़ी संख्या में बिहारियों को रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में दूसरे राज्यों में जाना पड़ा। उनके मुताबिक, उस दौर में शुरू हुआ पलायन आज भी एक बड़ी चुनौती रहा है। चिराग ने कहा कि मौजूदा समय में बिहार में हालात बदल रहे हैं और चीजों पर नियंत्रण पाया जा रहा है। उन्होंने अपने ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ के लक्ष्य को दोहराते हुए कहा कि आने वाले दिनों में बिहार को विकसित राज्य बनाने की दिशा में काम किया जाएगा। तेजस्वी यादव की नई भूमिका और चिराग पासवान के बयानों के बीच यह साफ है कि बिहार की राजनीति में आने वाले समय में सियासी बयानबाजी और तेज होने वाली है, जिसका असर सीधे राज्य की राजनीति पर पड़ेगा।

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