दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने वर्ष 2018 के चर्चित हर्ष फायरिंग मामले में बिहार के भाजपा विधायक राजू कुमार सिंह को चार साल की जेल की सजा सुनाई है। अदालत ने उन्हें गैर-इरादतन हत्या और आर्म्स एक्ट से जुड़े प्रावधानों के तहत दोषी माना। कोर्ट ने सजा के साथ पीड़ित परिवार को 25 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी आदेश दिया। यह मामला नए साल के जश्न के दौरान हुई फायरिंग से जुड़ा है, जिसमें डॉ. अर्चना गुप्ता की जान चली गई थी। अदालत के फैसले के बाद इस मामले ने राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर नई चर्चा शुरू कर दी है।
दो साल से अधिक की सजा का सीधा असर, चली गई विधायकी
अदालत से चार साल की सजा मिलने के साथ ही राजू कुमार सिंह की विधानसभा सदस्यता भी समाप्त हो गई। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के अनुसार यदि किसी सांसद या विधायक को किसी आपराधिक मामले में दो वर्ष या उससे अधिक की सजा होती है, तो वह दोषी ठहराए जाने की तारीख से ही सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य हो जाता है। यही कारण है कि कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद उनकी विधायकी पर भी प्रभाव पड़ा। यह प्रावधान जनप्रतिनिधियों के खिलाफ गंभीर अपराधों में दोषसिद्धि होने पर स्वतः लागू होता है और इसके लिए अलग से किसी अतिरिक्त आदेश की आवश्यकता नहीं होती।
क्या था पूरा मामला, जिसमें गई एक महिला की जान?
यह मामला 31 दिसंबर 2018 और 1 जनवरी 2019 की दरमियानी रात आयोजित एक न्यू ईयर समारोह से जुड़ा है। आरोप था कि जश्न के दौरान की गई फायरिंग में डॉ. अर्चना गुप्ता को गोली लग गई, जिससे उनकी मौत हो गई। मामले की जांच के दौरान पुलिस ने हथियार और गोला-बारूद भी बरामद किए थे। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि यह लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर जिम्मेदारी का मामला था, क्योंकि एक जनप्रतिनिधि से कानून का पालन कराने की अपेक्षा की जाती है। अदालत ने अपने फैसले में हर्ष फायरिंग को समाज के लिए गंभीर खतरा बताते हुए कहा कि ऐसे मामलों में सख्त संदेश देना जरूरी है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर रोक लग सके।
राजनीतिक सफर पर लगा बड़ा झटका
राजू कुमार सिंह बिहार की राजनीति का जाना-पहचाना चेहरा रहे हैं। वह कई बार विधायक चुने गए और अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ चुनाव जीत चुके हैं। अपने राजनीतिक जीवन में वह बिहार सरकार में पर्यटन मंत्री की जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं। हालांकि अब अदालत के फैसले के बाद उनके राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं। यदि वह इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती देते हैं, तो आगे की कानूनी प्रक्रिया के आधार पर स्थिति स्पष्ट होगी। फिलहाल कोर्ट के इस निर्णय ने यह संदेश जरूर दिया है कि कानून के सामने सभी समान हैं और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों पर भी वही नियम लागू होते हैं, जो आम नागरिकों पर लागू होते हैं।
