पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल के बीच अखिलेश यादव का कोलकाता दौरा चर्चा का केंद्र बन गया है। तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद वे ममता बनर्जी से मुलाकात करने पहुंचे हैं, लेकिन इस दौरे के समय को लेकर विपक्षी नेताओं के साथ-साथ सहयोगी दलों से भी सवाल उठने लगे हैं। इसी कड़ी में ओम प्रकाश राजभर ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जब चुनाव प्रचार का समय था, तब अखिलेश यादव बंगाल नहीं गए और अब हार के बाद मुलाकात का कोई खास मतलब नहीं रह जाता।
ओम प्रकाश राजभर का तंज: “इंतजार करती रहीं दीदी”
ओम प्रकाश राजभर ने सोशल मीडिया पर बयान जारी करते हुए कहा कि ममता बनर्जी को उम्मीद थी कि अखिलेश यादव चुनाव के दौरान उनका समर्थन करने आएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि “भीषण गर्मी में अखिलेश यादव घर से निकलते कहां हैं, रैलियां और रोड शो करना उनके लिए आसान नहीं है।” राजभर ने यह भी आरोप लगाया कि अखिलेश केवल सोशल मीडिया तक सीमित रहते हैं और जमीनी राजनीति से दूरी बनाए रखते हैं। उनके अनुसार, यह दौरा केवल औपचारिकता है, जिसमें वे एसी माहौल में बैठकर सांत्वना देने जा रहे हैं।
ममता बनर्जी हफ्तों इंतजार करती रहीं कि अखिलेश यादव अब आएंगे तब आएंगे। अखिलेश यादव नहीं गए। भयानक गर्मी में अखिलेश निकलते कहां हैं। कैसे रैलियां और रोड शो करेंगे? पसीना निकलेगा, गर्मी लगेगी। सुबह उठना भी पड़ेगा।
सबसे अच्छा काम यह है कि दोपहर में उठने के बाद एक ट्वीट कर देना। यह…
— Om Prakash Rajbhar (@oprajbhar) May 6, 2026
ईवीएम पर बहस को लेकर भी निशाना
ओम प्रकाश राजभर ने अखिलेश यादव पर यह आरोप भी लगाया कि वे चुनावी हार के बाद ईवीएम को मुद्दा बनाकर अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की कोशिश करते हैं। उन्होंने कहा कि बंगाल में मुलाकात के जरिए अखिलेश यादव यह संदेश देना चाहते हैं कि हार की वजह मशीनें हैं, न कि रणनीति की कमी। राजभर ने आगे कहा कि “यह तैयारी 2027 के चुनावों के लिए की जा रही है, ताकि भविष्य में हार का ठीकरा भी ईवीएम पर फोड़ा जा सके।” उनके इस बयान ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
मुलाकात के मायने और आगे की राजनीति
बंगाल चुनाव परिणाम के बाद यह पहली बार है जब कोई बड़ा विपक्षी नेता ममता बनर्जी से मिलने जा रहा है, जिससे इस मुलाकात के राजनीतिक संकेत भी निकाले जा रहे हैं। इससे पहले भी अखिलेश यादव ने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए भाजपा पर आरोप लगाए थे। हालांकि, इस मुलाकात को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मुलाकात से विपक्षी एकता को कितना बल मिलता है या यह केवल प्रतीकात्मक राजनीति तक सीमित रह जाती है।
