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बंगाल में अखिलेश यादव चाहते तो ममता को जीता सकते थे? योगी सरकार के मंत्री का चौंकाने वाला दावा

अखिलेश यादव के कोलकाता दौरे पर ओम प्रकाश राजभर का तीखा हमला, चुनाव से पहले बंगाल न जाने पर उठाए सवाल। जानें इस मुलाकात के राजनीतिक मायने और ईवीएम विवाद पर क्या बोले नेता।

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पश्चिम बंगाल की राजनीति में हलचल के बीच अखिलेश यादव का कोलकाता दौरा चर्चा का केंद्र बन गया है। तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद वे ममता बनर्जी से मुलाकात करने पहुंचे हैं, लेकिन इस दौरे के समय को लेकर विपक्षी नेताओं के साथ-साथ सहयोगी दलों से भी सवाल उठने लगे हैं। इसी कड़ी में ओम प्रकाश राजभर ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जब चुनाव प्रचार का समय था, तब अखिलेश यादव बंगाल नहीं गए और अब हार के बाद मुलाकात का कोई खास मतलब नहीं रह जाता।

ओम प्रकाश राजभर का तंज: “इंतजार करती रहीं दीदी”

ओम प्रकाश राजभर ने सोशल मीडिया पर बयान जारी करते हुए कहा कि ममता बनर्जी को उम्मीद थी कि अखिलेश यादव चुनाव के दौरान उनका समर्थन करने आएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि “भीषण गर्मी में अखिलेश यादव घर से निकलते कहां हैं, रैलियां और रोड शो करना उनके लिए आसान नहीं है।” राजभर ने यह भी आरोप लगाया कि अखिलेश केवल सोशल मीडिया तक सीमित रहते हैं और जमीनी राजनीति से दूरी बनाए रखते हैं। उनके अनुसार, यह दौरा केवल औपचारिकता है, जिसमें वे एसी माहौल में बैठकर सांत्वना देने जा रहे हैं।

ईवीएम पर बहस को लेकर भी निशाना

ओम प्रकाश राजभर ने अखिलेश यादव पर यह आरोप भी लगाया कि वे चुनावी हार के बाद ईवीएम को मुद्दा बनाकर अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की कोशिश करते हैं। उन्होंने कहा कि बंगाल में मुलाकात के जरिए अखिलेश यादव यह संदेश देना चाहते हैं कि हार की वजह मशीनें हैं, न कि रणनीति की कमी। राजभर ने आगे कहा कि “यह तैयारी 2027 के चुनावों के लिए की जा रही है, ताकि भविष्य में हार का ठीकरा भी ईवीएम पर फोड़ा जा सके।” उनके इस बयान ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।

मुलाकात के मायने और आगे की राजनीति

बंगाल चुनाव परिणाम के बाद यह पहली बार है जब कोई बड़ा विपक्षी नेता ममता बनर्जी से मिलने जा रहा है, जिससे इस मुलाकात के राजनीतिक संकेत भी निकाले जा रहे हैं। इससे पहले भी अखिलेश यादव ने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए भाजपा पर आरोप लगाए थे। हालांकि, इस मुलाकात को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मुलाकात से विपक्षी एकता को कितना बल मिलता है या यह केवल प्रतीकात्मक राजनीति तक सीमित रह जाती है।

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