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गोरखपुर में मची अफरा-तफरी: CM योगी के अभेद्य सुरक्षा घेरे में आखिर कैसे घुस आया ‘यमदूत’? हुआ एक्शन

गोरखपुर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सुरक्षा में एक बार फिर बड़ी चूक हुई है। 15 दिन के भीतर दूसरी बार काफिले के सामने आई बाधा ने सुरक्षा इंतजामों की पोल खोल दी है। जानिए पूरी घटना और प्रशासन द्वारा की गई सख्त कार्रवाई के बारे में। चमकती लाइटें और वीवीआईपी प्रोटोकॉल, फिर भी हो गई बड़ी चूक

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व्यवस्थाओं में से एक माना जाता है। लेकिन हाल ही में गोरखपुर के गोरखनाथ क्षेत्र में जो हुआ, उसने न केवल पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि सुरक्षा एजेंसियों के भी होश उड़ा दिए हैं। मुख्यमंत्री जब नए ओवरब्रिज के लोकार्पण के लिए निकले थे, तब पूरे मार्ग को ‘जीरो जोन’ घोषित किया गया था। अचानक सुरक्षा घेरे को तोड़ते हुए एक गोवंश (सांड) सीधे मुख्यमंत्री के काफिले की तरफ दौड़ पड़ा। चंद सेकंड के लिए वहां मौजूद अधिकारियों और सुरक्षाकर्मियों की सांसें अटक गईं। अफरा-तफरी के माहौल के बीच तैनात जवानों ने अपनी फुर्ती दिखाई और जान जोखिम में डालकर गोवंश को काबू किया। इस पूरी घटना का वीडियो अब सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहा है, जिसे देखकर लोग हैरान हैं कि इतने कड़े पहरे के बीच यह कैसे संभव हुआ।

लापरवाही पर चला ‘बाबा’ का हंटर: सुपरवाइजर निलंबित

इस सुरक्षा चूक को शासन ने बेहद गंभीरता से लिया है। जैसे ही यह खबर लखनऊ तक पहुँची, प्रशासन में हड़कंप मच गया। नगर आयुक्त ने इस मामले में तत्काल संज्ञान लेते हुए जांच के आदेश दिए। शुरुआती जांच में यह पाया गया कि वीवीआईपी मूवमेंट के दौरान आवारा पशुओं को हटाने की जिम्मेदारी जिन कर्मचारियों की थी, उन्होंने अपने काम में घोर लापरवाही बरती। इसी का नतीजा है कि नगर निगम के सुपरवाइजर अरविंद कुमार को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। अधिकारियों का साफ कहना है कि मुख्यमंत्री की सुरक्षा के साथ किसी भी तरह का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस कार्रवाई ने विभाग के अन्य कर्मचारियों के बीच भी कड़ा संदेश भेजा है कि ड्यूटी के दौरान छोटी सी चूक भी करियर खत्म कर सकती है।

15 दिन के अंदर दूसरा कांड: क्या फेल हो रहा है सुरक्षा प्लान?

हैरानी की बात यह है कि मुख्यमंत्री के साथ ऐसी घटना पहली बार नहीं हुई है। मात्र 15 दिनों के भीतर यह दूसरी बड़ी सुरक्षा चूक है। इससे पहले 4 दिसंबर को जब सीएम योगी स्पोर्ट्स कॉलेज से एयरपोर्ट की तरफ जा रहे थे, तब असुरन इलाके में उनके ‘वार्निंग पायलट’ वाहन के सामने अचानक एक बस आ गई थी। उस समय भी प्रशासन ने कुछ पुलिसकर्मियों पर गाज गिराई थी, लेकिन सवाल अब भी वही है—क्या पिछली गलतियों से कोई सबक नहीं लिया गया? गोरखपुर जैसे संवेदनशील शहर में, जो मुख्यमंत्री का गृह क्षेत्र भी है, वहां बार-बार रूट क्लियरेंस में ऐसी खामियां मिलना प्रशासन की बड़ी विफलता को दर्शाता है। क्या वीवीआईपी प्रोटोकॉल का पालन सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया है?

सुरक्षा तंत्र की समीक्षा और भविष्य की चुनौतियां

इस घटना ने खुफिया एजेंसियों और जिला प्रशासन को दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया है। मुख्यमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था में ‘एडवांस सिक्योरिटी लायजन’ (ASL) का पालन किया जाता है, जिसमें रूट के हर इंच की पड़ताल होती है। बावजूद इसके, कभी बस तो कभी गोवंश का काफिले के सामने आना यह संकेत देता है कि स्थानीय स्तर पर समन्वय की भारी कमी है। अब आदेश दिए गए हैं कि भविष्य में होने वाले किसी भी वीवीआईपी मूवमेंट से पहले रूट की तीन स्तरीय समीक्षा की जाए और आवारा पशुओं व यातायात प्रबंधन के लिए विशेष टास्क फोर्स तैनात की जाए। जनता भी अब सवाल पूछ रही है कि जब मुख्यमंत्री खुद अपने शहर में सुरक्षित नहीं महसूस कर पा रहे, तो आम जनता की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले इन अधिकारियों पर भरोसा कैसे किया जाए?

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