इंसान की सबसे बड़ी फितरत है मौत को हराना और जीवन को थामे रखना, लेकिन कभी-कभी जीवन खुद एक ऐसी सजा बन जाता है जहाँ मौत ही एकमात्र पुरस्कार नजर आती है। हरीश राणा का मामला कुछ ऐसा ही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को ‘इच्छामृत्यु’ (Euthanasia) की इजाजत देकर एक ऐतिहासिक और बेहद भावुक बहस छेड़ दी है। सोचिए, उस मां के दिल पर क्या गुजरी होगी जिसने अपने कलेजे के टुकड़े को मौत के आगोश में भेजने वाले कागजों पर दस्तखत किए होंगे? यह केवल एक कानूनी फैसला नहीं है, बल्कि उस ममता की हार है जिसने दशकों तक उम्मीद का दीया जलाए रखा। लेकिन सच तो यह है कि हरीश राणा अकेले नहीं मरेंगे। जब कोई इंसान इस तरह विदा होता है, तो उसके साथ उससे जुड़े हर व्यक्ति के भीतर का एक हिस्सा हमेशा के लिए मर जाता है। वक़्त के साथ यादें धुंधली पड़ सकती हैं, लेकिन यह टीस हमेशा बनी रहेगी कि क्या हमारे पास उसे बचाने का कोई और रास्ता नहीं था?
अरुणा शानबाग से हरीश राणा तक: आखिर क्यों बदल गया अदालत का नजरिया?
आज जब सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु की इजाजत दी है, तो जहन में अरुणा शानबाग का वो मशहूर केस कौंध जाता है। कई साल पहले जब अरुणा के लिए दयामृत्यु की मांग की गई थी, तब अस्पताल की नर्सें उनके हक में ढाल बनकर खड़ी हो गई थीं। उन्होंने कहा था कि वे अरुणा को मरने नहीं देंगी और बरसों तक उनकी सेवा करती रहेंगी। तब अदालत ने इजाजत देने से इनकार कर दिया था क्योंकि वहां ‘समर्पण’ की दीवार ऊंची थी। तो फिर हरीश के मामले में ऐसा क्या अलग था? विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके पीछे समाज की बदलती संरचना एक बड़ी वजह है। बढ़ता व्यक्तिवाद और बिखरते संयुक्त परिवारों ने हमें भीतर से इतना अकेला कर दिया है कि अब अपनों की ‘गरिमापूर्ण मृत्यु’ ही एकमात्र समाधान नजर आती है। जहाँ अरुणा के पास एक पूरा अस्पताल परिवार बनकर खड़ा था, वहीं आज के दौर में एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए दशकों तक ‘यंत्रवत’ जीवन को संभालना आर्थिक और मानसिक रूप से असंभव होता जा रहा है।
जीवन और मृत्यु की गरिमा: क्या हम सिर्फ एक ‘मशीनी समाज’ बन रहे हैं?
हरीश राणा का केस हमारे समाज के मुंह पर एक बड़ा तमाचा भी है। हम अक्सर ‘राइट टू लाइफ’ (जीवन का अधिकार) की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन क्या असल में हम गरिमापूर्ण जीवन जी पा रहे हैं? भारत में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी और बुनियादी इलाज भी नसीब नहीं है। जब जीवन में ही गरिमा नहीं बची, तो मृत्यु गरिमापूर्ण कैसे होगी? विडंबना देखिए कि जिस शरीर को बचाने के लिए विज्ञान ने इतनी तरक्की की, वही शरीर कई बार मौत को रोकने वाली जेल बन जाता है। समाज में बढ़ती यह हताशा इशारा करती है कि हम धीरे-धीरे संवेदनाओं से शून्य हो रहे हैं। पहले पड़ोस और समाज दुख बांट लिया करते थे, लेकिन अब हर कोई अपनी लड़ाई अकेले लड़ रहा है। यही वजह है कि आज मौत को एक ‘मुक्ति’ के रूप में देखा जा रहा है, न कि एक क्षति के रूप में।
नया कानून और ‘मौत का कारोबार’: आने वाले कल की सबसे बड़ी चुनौती
सुप्रीम कोर्ट ने अब सरकार से इच्छामृत्यु पर कानून बनाने को कहा है, लेकिन यहीं से असली डर शुरू होता है। यह कानून उन परिवारों के लिए तो वरदान साबित हो सकता है जिनका जीवन वाकई यंत्रणा बन चुका है, लेकिन क्या इसके दुरुपयोग को रोका जा सकेगा? डर इस बात का है कि कहीं यह कानून ‘मौत का नया कारोबार’ न शुरू कर दे। क्या स्वार्थी लोग अपने बुजुर्गों या अशक्त परिजनों को इलाज दिलाने के बजाय उन्हें कानूनी रूप से ‘रास्ते से हटाने’ के लिए इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं करेंगे? हमारे देश में हर साल लाखों लोग खुदकुशी करते हैं, अगर यह हताशा इच्छामृत्यु की मांग में बदल गई तो समाज का क्या होगा? कानून तो बन जाएगा, लेकिन उस कानून की रूह को बचाने की जिम्मेदारी समाज की होगी। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम केवल ‘मरने के अधिकार’ पर ध्यान न दें, बल्कि ‘सम्मान के साथ जीने’ की स्थितियों को भी सुधारें।
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