उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक फैसला सामने आया है। प्रदेश की 57 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो रहा है, लेकिन समय पर चुनाव न होने के कारण अब गांवों की सत्ता अस्थायी रूप से प्रशासकों के हाथों में जाएगी। खास बात यह है कि इस बार सरकार ने ग्राम प्रधानों की मांग मानते हुए उन्हें ही प्रशासक बनाने की तैयारी की है। इससे पहले पंचायतों का संचालन एडीओ पंचायत जैसे अधिकारियों के जरिए कराया जाता था। सरकार के इस फैसले को गांवों में विकास कार्यों को प्रभावित होने से बचाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। वहीं पंचायत चुनाव 2027 विधानसभा चुनाव के बाद होने की संभावना ने प्रदेश की राजनीति को भी गर्म कर दिया है।
ओबीसी आरक्षण और अधूरी तैयारियों ने बढ़ाई देरी
प्रदेश में पंचायत चुनाव समय पर न हो पाने की सबसे बड़ी वजह पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन में हुई देरी को माना जा रहा है। सरकार ने हाल ही में आयोग का गठन तो कर दिया है, लेकिन उसकी रिपोर्ट आने में अभी समय लगेगा। इसके अलावा मतदाता सूची का नवीनीकरण भी पूरी तरह पूरा नहीं हो पाया है। कई मामलों को लेकर हाईकोर्ट में याचिकाएं भी लंबित हैं, जिनकी सुनवाई का असर चुनाव प्रक्रिया पर पड़ रहा है। ऐसे में सरकार के सामने चुनाव टालने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं बचा। सूत्रों के मुताबिक अब पंचायत चुनाव 2027 विधानसभा चुनाव के बाद ही कराए जा सकते हैं। इसका सीधा असर प्रदेश की ग्रामीण राजनीति पर पड़ेगा, क्योंकि अगले करीब दो वर्षों तक गांवों की प्रशासनिक व्यवस्था अस्थायी ढांचे पर चलेगी।
ग्राम प्रधानों को मिली राहत
सरकार के इस फैसले से मौजूदा ग्राम प्रधानों में राहत का माहौल है। प्रधान संगठनों का कहना है कि यदि अधिकारियों को प्रशासक बनाया जाता तो गांवों के छोटे-बड़े विकास कार्यों की रफ्तार धीमी पड़ जाती। स्थानीय स्तर की समस्याओं को समझने और जनता से सीधे जुड़े रहने के कारण ग्राम प्रधान प्रशासनिक जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से संभाल सकते हैं। ग्रामीण इलाकों में सड़क, सफाई, पेयजल और सरकारी योजनाओं से जुड़े कई काम पंचायतों के जरिए ही पूरे होते हैं। ऐसे में प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने से योजनाओं की निरंतरता बनी रहने की उम्मीद है। हालांकि इस फैसले पर अंतिम आदेश जारी होना अभी बाकी है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां तेज हो गई हैं।
विपक्ष ने सरकार पर साधा निशाना
पंचायत चुनाव में देरी को लेकर विपक्षी दलों ने प्रदेश सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी समेत कई दलों ने आरोप लगाया है कि सरकार ने जानबूझकर पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन में देरी की, ताकि पंचायत चुनाव टाले जा सकें। विपक्ष का कहना है कि बीजेपी को ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक नुकसान का डर था, इसलिए चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। वहीं सत्ताधारी दल का दावा है कि सरकार संविधान और आरक्षण नियमों का पालन करते हुए पूरी पारदर्शिता से प्रक्रिया पूरी करना चाहती है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पंचायत चुनाव टलने का असर 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीतियों पर भी दिखाई देगा। गांवों की राजनीति हमेशा से यूपी की सत्ता का आधार मानी जाती रही है, इसलिए पंचायत चुनाव का मुद्दा आने वाले समय में और ज्यादा राजनीतिक रंग ले सकता है।
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