उत्तर प्रदेश के लालधर सहाय ने हाल ही में एक मिसाल कायम की है। लंबी बीमारी के बाद उनकी मां का निधन 22 नवंबर को हो गया। अपने माता-पिता के अंतिम संस्कार और घर की जिम्मेदारियों के बावजूद, BLO लालधर सहाय ने पेशेवर जिम्मेदारी को प्राथमिकता दी। उन्होंने न केवल अंतिम संस्कार के तुरंत बाद ड्यूटी पर लौटकर अपने कर्तव्य का निर्वाह किया, बल्कि यह साबित कर दिया कि व्यक्तिगत और पेशेवर जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखना संभव है।
ड्यूटी का दबाव और तेरहवीं की तारीख में बदलाव
लालधर सहाय एसआईआर (स्पेशल इंटेसिव रिवीजन) की चुनाव ड्यूटी पर लगे हुए थे। उनकी मां की तेरहवीं 5 दिसंबर को थी, लेकिन चुनाव ड्यूटी के चलते वे घर नहीं रह सके। परिवार के सदस्यों से चर्चा करने के बाद उन्होंने तेरहवीं की तारीख बढ़ाकर 13 दिसंबर कर दी। इस कदम ने यह दर्शाया कि व्यक्तिगत दुख और सामाजिक/पारिवारिक परंपराओं के बीच संतुलन बनाए रखना संभव है।
समाज और सहयोगियों के लिए प्रेरणादायक उदाहरण
लालधर सहाय की यह कहानी उनके सहकर्मियों और समाज के लिए प्रेरणा बन गई है। ड्यूटी और परिवार की जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाए रखने का यह उदाहरण युवा कर्मचारियों के लिए सीख साबित हो सकता है। उनके समर्पण और जिम्मेदारी ने यह संदेश दिया कि कठिन समय में भी कर्तव्य और परिवार दोनों को प्राथमिकता दी जा सकती है।
पारिवारिक परंपरा और पेशेवर जिम्मेदारी का संतुलन
अंततः लालधर सहाय ने दिखाया कि परिवार की परंपरा और पेशेवर जिम्मेदारी दोनों को सम्मान दिया जा सकता है। तेरहवीं को 5 से 13 दिसंबर तक बढ़ाना केवल एक तारीख का परिवर्तन नहीं था, बल्कि यह एक संवेदनशील निर्णय था, जिसने परिवार और पेशेवर जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखा। इस घटना ने समाज को यह भी सिखाया कि मुश्किल समय में सही निर्णय लेना और जिम्मेदारी निभाना ही सच्चा सम्मान है।
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