उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों एक पुरानी तस्वीर नए रंग में नजर आ रही है। लखनऊ की पहचान बन चुके स्मारकों को लेकर कभी बहुजन समाज पार्टी (BSP) की तीखी आलोचना करने वाली BJP, अब खुद उसी राह पर चलती दिख रही है। राजधानी लखनऊ के ऐशबाग में बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम पर एक विशाल स्मारक और सांस्कृतिक केंद्र का निर्माण युद्ध स्तर पर जारी है। करीब 5,493 वर्ग मीटर में फैल रहे इस प्रोजेक्ट ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। दिलचस्प बात यह है कि जिस ‘स्मारक संस्कृति’ को BJP कभी फिजूलखर्ची बताती थी, आज उसी के जरिए वह दलितों के दिल में जगह बनाने की कोशिश कर रही है। समर्थक भी इस यू-टर्न को देखकर हैरान हैं, लेकिन पार्टी इसे महापुरुषों के सम्मान से जोड़कर देख रही है।
45 करोड़ से 100 करोड़ तक पहुँचा बजट
इस स्मारक की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शुरुआत में इसका बजट करीब 45 करोड़ रुपये तय किया गया था, लेकिन विस्तार और आधुनिक सुविधाओं के जुड़ने के बाद यह आंकड़ा अब 100 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है। इस स्मारक में बाबा साहेब की 25 फीट ऊंची प्रतिमा मुख्य आकर्षण होगी। इसके अलावा, यहाँ केवल पत्थर की इमारतें नहीं होंगी, बल्कि एक अत्याधुनिक ऑडिटोरियम, लाइब्रेरी, रिसर्च सेंटर और शोधकर्ताओं के लिए विशेष सुविधाएं भी विकसित की जा रही हैं। 2022 में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा रखी गई इसकी नींव अब एक विशाल स्वरूप ले चुकी है। सरकार का लक्ष्य है कि जुलाई 2027 तक इसे पूरी तरह तैयार कर जनता को समर्पित कर दिया जाए।
2024 के ‘झटके’ के बाद बदला बीजेपी का गेम प्लान
BJP का यह कदम 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों का सीधा असर है। चुनाव के दौरान विपक्ष ने ‘संविधान बचाओ’ और ‘आरक्षण’ के मुद्दे को जिस तरह हवा दी, उससे BJP का पारंपरिक दलित वोट बैंक खिसककर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के पाले में चला गया। उत्तर प्रदेश में सपा का सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरना बीजेपी के लिए एक बड़ा अलार्म था। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। इस स्मारक के जरिए बीजेपी यह संदेश देना चाहती है कि वह न केवल संविधान की रक्षक है, बल्कि बाबा साहेब के मूल्यों को सहेजने में भी सबसे आगे है। यह एक तरह से विपक्ष के ‘संविधान’ वाले नैरेटिव की काट मानी जा रही है।
2027 की चुनावी बिसात और दलित वोटरों की अहमियत
लखनऊ में पहले से ही मायावती काल का एक विशाल अंबेडकर स्मारक मौजूद है, ऐसे में दूसरे स्मारक की जरूरत पर सवाल उठना लाजिमी है। हालांकि, BJP इसे ‘सांस्कृतिक केंद्र’ बताकर अलग पेश कर रही है। असल लड़ाई उस दलित वोट बैंक को वापस पाने की है, जिसने पिछले एक दशक से BJP की जीत में बड़ी भूमिका निभाई थी। अगर 2027 से पहले यह स्मारक बनकर तैयार होता है, तो BJP इसे अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करेगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ईंट और पत्थरों से बना यह नया स्मारक दलित समाज के उन घावों को भर पाएगा, जो पिछले चुनाव में विपक्ष की रणनीतियों से उभरे थे। यूपी की सत्ता का रास्ता दलित वोटों से होकर गुजरता है, और बीजेपी इस रास्ते पर अब पूरी ताकत झोंक चुकी है।
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