सनी देओल स्टारर फिल्म बॉर्डर 2 (Border 2) जैसे ही रिलीज के करीब पहुंची, वैसे ही इसके गानों को लेकर चर्चा तेज हो गई। फिल्म के गाने सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर दर्शकों की राय बंटी हुई नजर आई। एक वर्ग को नए गाने ठीक-ठाक लगे, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे दर्शक भी रहे जिन्हें इन गानों में वो भावनात्मक गहराई और देशभक्ति की आग महसूस नहीं हुई, जो 1997 में आई बॉर्डर के गानों में थी। “संदेशे आते हैं”, “संदेशे आते हैं” जैसे गीत आज भी लोगों की आंखें नम कर देते हैं, जबकि बॉर्डर 2 (Border 2) के गाने उस असर को दोहराने में नाकाम माने गए। इसी तुलना के बीच सोशल मीडिया पर यह मांग उठने लगी कि फिल्म के गाने जावेद अख्तर जैसे दिग्गज गीतकार से लिखवाए जाने चाहिए थे, जिन्होंने पहले भी देशभक्ति को शब्दों में जान डाल दी है।
मेकर्स ने किया था संपर्क, लेकिन जावेद अख्तर ने साफ कह दिया ‘न’
अब इस पूरे विवाद पर खुद गीतकार जावेद अख्तर का बयान सामने आया है, जिसने बहस को और तेज कर दिया है। एक इंटरव्यू में जावेद अख्तर ने खुलासा किया कि बॉर्डर 2 (Border 2) के मेकर्स ने उनसे फिल्म के लिए गाने लिखने का अनुरोध किया था। हालांकि, उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से मना कर दिया। जावेद अख्तर के मुताबिक, उन्हें लगा कि मेकर्स नई सोच और नए विचारों पर काम करने के बजाय पुरानी फिल्म की लोकप्रियता और उसके गीतों की विरासत के भरोसे आगे बढ़ना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जब कोई फिल्म सिर्फ अतीत की सफलता को भुनाने की कोशिश करती है, तो उसमें रचनात्मक ईमानदारी की कमी नजर आती है। यही कारण था कि उन्होंने शुरुआत में ही इस प्रोजेक्ट से दूरी बना ली।
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‘इंटेलेक्चुअल और क्रिएटिव बैंकरप्सी’ कहकर जावेद अख्तर ने मेकर्स को लताड़ा
जावेद अख्तर ने अपने बयान में बेहद सख्त शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि पुरानी फिल्म के गीतों या भावनाओं को बार-बार दोहराने की कोशिश करना “इंटेलेक्चुअल और क्रिएटिव बैंकरप्सी” यानी बौद्धिक और रचनात्मक दिवालियापन है। उनके मुताबिक, सिनेमा का मतलब सिर्फ नॉस्टेल्जिया बेचना नहीं होना चाहिए, बल्कि हर नई फिल्म को अपने समय की सच्चाई, भावनाओं और संघर्षों को नए शब्दों और नए सुरों में पेश करना चाहिए। जावेद अख्तर का मानना है कि अगर कोई मेकर सिर्फ इसलिए किसी गीतकार को अप्रोच करता है ताकि पुराने हिट गानों की याद ताजा कराई जा सके, तो यह कला के साथ समझौता है। यही वजह रही कि उन्होंने बॉर्डर 2 (Border 2) के लिए गीत लिखने से इनकार कर दिया, भले ही फिल्म का नाम और उससे जुड़ी भावनाएं कितनी ही बड़ी क्यों न हों।
Border 2 विवाद से क्या सीख मिलेगी
जावेद अख्तर का यह बयान सिर्फ बॉर्डर 2 (Border 2) तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे पूरी फिल्म इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा संदेश माना जा रहा है। दर्शक अब सिर्फ पुराने नाम और यादों के सहारे बनी फिल्मों से संतुष्ट नहीं हैं। वे नई कहानियां, नए गीत और नई सोच देखना चाहते हैं। बॉर्डर 2 (Border 2) के गानों को लेकर उठी यह बहस दिखाती है कि देशभक्ति जैसे संवेदनशील विषय पर काम करते समय सिर्फ पुराने फॉर्मूले दोहराना काफी नहीं होता। जावेद अख्तर जैसे दिग्गज का ऑफर ठुकराना और मेकर्स की सोच पर सवाल उठाना इस बात की ओर इशारा करता है कि रचनात्मकता से समझौता करने की कीमत फिल्मों को आलोचना के रूप में चुकानी पड़ती है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या मेकर्स इस आलोचना से सबक लेते हैं या फिर दर्शक बॉर्डर जैसी भावनात्मक गहराई को सिर्फ यादों में ही ढूंढते रह जाएंगे।
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