मेरठ की जिला अदालत द्वारा चर्चित नीला ड्रम हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद एक बार फिर देश में महिला कैदियों को मिलने वाली सजा-ए-मौत पर बहस तेज हो गई है। लगभग 13 महीने लंबी चली सुनवाई, 127 पेशियों और 22 से अधिक गवाहों के बयानों के आधार पर अदालत ने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इस सनसनीखेज मामले के सामने आने के बाद हर किसी के जेहन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर भारत की विभिन्न जेलों में ऐसी कितनी महिलाएं हैं, जिन्हें अदालत मौत की सजा सुना चुकी है, लेकिन कानूनी प्रक्रियाओं और अन्य वजहों से उन्हें अब तक फांसी नहीं दी गई है।
डेथ-रो पर मौजूद महिलाओं के चौंकाने वाले आंकड़े
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस समय देश भर की जेलों में कुल 571 कैदी डेथ-रो यानी फांसी की सजा के इंतजार में हैं, जिनमें से 21 महिलाएं शामिल हैं। इन महिला कैदियों में से कुछ के मामलों पर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में कानूनी सुनवाई चल रही है, तो कुछ मामलों में राष्ट्रपति के पास दया याचिकाएं लंबित हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि इन 21 महिला डेथ-रो कैदियों में से अकेले उत्तर प्रदेश राज्य से 9 महिलाएं हैं, जो कुल संख्या का लगभग आधा हिस्सा है। इसके अलावा केरल, हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की महिलाएं भी इस सूची में शामिल हैं।
सबसे चर्चित शबनम का मामला और अन्य पेंडिंग केस
उत्तर प्रदेश का शबनम हत्याकांड देश के सबसे भयानक और चर्चित मामलों में से एक है, जिसे आज भी लोग नहीं भूले हैं। साल 2008 में शबनम को अपने ही परिवार के सात सदस्यों की बेरहमी से हत्या करने का दोषी ठहराया गया था, जिसके बाद 2010 में निचली अदालत ने उसे मौत की सजा सुनाई। इलाहाबाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह सजा बरकरार रखे जाने, रिव्यू पिटीशन और दया याचिका खारिज होने के बावजूद शबनम को अभी तक फांसी पर नहीं लटकाया गया है। इसके अलावा गीता देवी, जालधारा, रूपा सिंह, नजीमा और हसीमा जैसी अन्य महिलाओं की सजा को अभी उच्च न्यायालयों द्वारा अंतिम रूप से पुष्टि मिलना बाकी है, जिससे उनकी कानूनी प्रक्रियाएं जारी हैं।
कानूनी पेचीदगियां और फांसी में देरी की वजहें
भारत के न्याय तंत्र में किसी भी मु मुजरिम, खासकर महिला कैदियों को मौत की सजा देने से पहले बेहद लंबी और कड़ी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। दया याचिका, पुनर्विचार याचिका और अदालतों में लगातार अपील के चलते कई बार मामलों में सालों-साल का वक्त लग जाता है। मुस्कान रस्तोगी को सजा मिलने के बाद एक बार फिर यह साफ हो गया है कि अदालत द्वारा डेथ सेंटेंस सुनाए जाने के बाद भी फांसी के फंदे तक पहुंचने का सफर अनगिनत कानूनी अड़चनों और नियमों से होकर गुजरता है। यही वजह है कि गंभीर अपराधों की दोषी होने के बावजूद कई महिलाएं वर्षों से जेल की सलाखों के पीछे अपनी बारी का इंतजार कर रही है
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