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युद्ध के बीच सस्ता हुआ कच्चा तेल, क्या अब पेट्रोल-डीजल के दाम भी घटेंगे? जानिए पूरा गणित

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अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने पश्चिम एशिया से कच्चे तेल की सप्लाई को प्रभावित किया है। होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर जैसे अहम समुद्री रास्तों पर जोखिम बढ़ने से खाड़ी देशों से होने वाले तेल निर्यात में भी कमी आई है। इसके बावजूद ग्लोबल ऑयल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के नीचे बनी हुई है। यानी एक तरफ युद्ध और तनाव के कारण सप्लाई घट रही है, वहीं दूसरी तरफ तेल की कीमतों में वैसी तेजी नहीं दिख रही, जैसी आमतौर पर ऐसे हालात में देखने को मिलती है।

18 मिलियन से घटकर 11 मिलियन बैरल रोजाना हुआ शिपमेंट

प्राइस रिपोर्टिंग एजेंसी Argus के आंकड़ों के मुताबिक, पश्चिम एशिया के तेल उत्पादक देशों से क्रूड का शिपमेंट अब करीब 11 मिलियन बैरल प्रति दिन रह गया है। सात महीने पहले, ईरान में जंग शुरू होने से पहले यही आंकड़ा लगभग 18 मिलियन बैरल प्रतिदिन था। इसका मतलब है कि वैश्विक बाजार तक पहुंचने वाले तेल की मात्रा में बड़ी गिरावट आई है। इसके बावजूद कीमतों का 100 डॉलर के नीचे रहना संकेत देता है कि केवल सप्लाई में कमी ही तेल की कीमत तय नहीं कर रही है।

कमजोर मांग ने बिगाड़ा तेल बाजार का गणित

दरअसल, इस समय दुनिया के कई बड़े बाजारों में तेल की मांग उतनी मजबूत नहीं है। आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती, औद्योगिक मांग में कमजोरी और ईंधन की खपत में अपेक्षाकृत धीमी बढ़ोतरी का असर क्रूड की कीमतों पर पड़ रहा है। ऐसे में सप्लाई बाधित होने के बावजूद बाजार में मांग का दबाव कीमतों को ऊपर जाने से रोक रहा है। इसके अलावा तेल बाजार में मौजूद भंडार और दूसरे स्रोतों से मिलने वाली सप्लाई भी अचानक पैदा हुई कमी को कुछ हद तक संतुलित कर रही है। यही वजह है कि युद्ध के माहौल के बावजूद क्रूड में उम्मीद के मुताबिक उछाल नहीं आया।

आगे क्या होगा, इसी पर टिकी हैं तेल की कीमतें

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका-ईरान तनाव और कितना बढ़ता है और इसका असर होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल पर कितना पड़ता है। अगर सप्लाई में और बड़ी रुकावट आती है और साथ ही मांग में सुधार होता है तो ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर के पार जा सकता है। लेकिन अगर तनाव के बावजूद वैकल्पिक सप्लाई बनी रहती है और वैश्विक मांग कमजोर रहती है, तो कीमतों पर दबाव जारी रह सकता है। फिलहाल बाजार की नजर युद्ध से ज्यादा इस बात पर है कि वास्तव में कितनी सप्लाई रुकती है और खरीदार कितना तेल खरीद रहे हैं।

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