यूपी की सियासत में इन दिनों एक नाम बहुत तेजी से गूंज रहा है और वह नाम है—पूजा शुक्ला। समाजवादी पार्टी की यह युवा नेता अचानक से लखनऊ के सियासी गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गई हैं। हाल ही में लखनऊ में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के कार्यक्रम और ‘गौ रक्षा धर्म यात्रा’ के दौरान पूजा शुक्ला जिस तरह से सबसे आगे नजर आईं, उसने यूपी की राजनीति के जानकारों को चौंका दिया है। मंच से लेकर पोस्टरों तक पर गौ माता को राष्ट्रमाता घोषित करने की मांग को प्रमुखता से उठाया गया। राजनीति के पंडित इसे सिर्फ एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं मान रहे हैं, बल्कि इसे अखिलेश यादव के उस मास्टरस्ट्रोक के रूप में देखा जा रहा है, जो 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा सकता है।
लाठियां खाईं, जेल गईं… छात्र राजनीति से उभरा वो ‘तेजतर्रार’ चेहरा
एक मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाली पूजा शुक्ला का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। लखनऊ विश्वविद्यालय में एमए की पढ़ाई के दौरान साल 2017 में उन्होंने मुख्यमंत्री के काफिले को काला झंडा दिखाकर रातों-रात पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था। इस घटना के बाद उन्हें जेल जाना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इसके बाद नागरिकता संशोधन कानून (CAA-NRC) के विरोध प्रदर्शनों में भी वह सड़क पर उतरीं और दोबारा जेल की सलाखों के पीछे गईं। पूजा शुक्ला ने साबित किया कि वह सिर्फ एसी कमरों में बैठकर राजनीति करने वाली नेता नहीं हैं, बल्कि जमीन पर उतरकर लाठियां खाने का दम रखती हैं। यही वजह है कि उनकी छवि एक जुझारू और संघर्षशील युवा नेता के रूप में स्थापित हो गई।
जब ‘नेताजी’ ने पीठ पर रखा हाथ और बदल गई किस्मत
पूजा शुक्ला के जीवन में सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ‘नेताजी’ से मुलाकात की। जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं को परखने में माहिर नेताजी ने पूजा के भीतर छुपी राजनीतिक क्षमता को तुरंत पहचान लिया। उनके निर्देश पर पूजा को समाजवादी छात्र सभा में बड़ी जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद अखिलेश यादव ने भी उन पर पूरा भरोसा जताया और साल 2022 के विधानसभा चुनाव में लखनऊ मध्य जैसी हॉट सीट से उन्हें विधानसभा का टिकट दे दिया। हालांकि वह चुनाव जीत नहीं सकीं, लेकिन उन्होंने जिस मजबूती से चुनाव लड़ा, उसने सपा के भीतर उनके कद को बहुत ऊंचा कर दिया।
2027 से पहले सपा का ‘ब्राह्मण कार्ड’ या सोशल इंजीनियरिंग का नया फॉर्मूला?
आमतौर पर समाजवादी पार्टी को ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की राजनीति के लिए जाना जाता है, लेकिन पूजा शुक्ला के जरिए अखिलेश यादव अब एक नई सोशल इंजीनियरिंग तैयार कर रहे हैं। यूपी में ब्राह्मण मतदाता हमेशा से सरकार बनाने और बिगाड़ने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। शंकराचार्य के कार्यक्रम में पूजा शुक्ला की सक्रियता और सनातन धर्म व गौ रक्षा से जुड़े मुद्दों पर उनका मुखर होना यह साफ संकेत देता है कि सपा अब सवर्ण मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिए पूरी तरह तैयार है। पूजा शुक्ला को पार्टी के एक उभरते हुए ब्राह्मण चेहरे के रूप में आगे करके अखिलेश यादव ने विपक्ष को बैकफुट पर धकेलने का एक बड़ा और दिलचस्प दांव खेल दिया है।
