ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई का अंतिम विदाई समारोह शुरू हो चुका है, जिसे लेकर तेहरान से लेकर पूरी दुनिया की सियासत गरमा गई है। तेहरान के ग्रैंड मोसाला में एक ऊंचे स्टेज पर खामेनेई के पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा गया है, जहां वैश्विक नेताओं का पहुंचना जारी है। लेकिन इस पूरे आयोजन में जिस एक चीज ने दुनिया भर के विचारकों और रणनीतिकारों का ध्यान सबसे ज्यादा खींचा है, वह है खामेनेई के ताबूत पर लिपटा एक खास लाल झंडा। यह झंडा उनके पैतृक शहर मशहद की मशहूर इमाम रजा दरगाह से लाया गया है। इस लाल झंडे को ताबूत पर रखने के पीछे एक बेहद गहरा धार्मिक और राजनीतिक संदेश छिपा है, जिसे समझने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटना जरूरी है।
क्या है इस लाल झंडे का रहस्य और गहरा इतिहास?
इस्लामिक मामलों के जानकारों और अंतरराष्ट्रीय प्रोफेसरों के मुताबिक, इस लाल झंडे का सीधा संबंध शिया इस्लाम के सबसे बड़े बलिदान यानी कर्बला की शहादत से है। 7वीं सदी में हुई कर्बला की लड़ाई में पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन की हत्या कर दी गई थी, जिन्हें शिया समुदाय में सर्वोच्च सम्मान हासिल है। शिया परंपरा में लाल झंडा सीधे तौर पर इमाम हुसैन के उसी बलिदान और उनके अन्याय के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक माना जाता है। ईरान के इस कदम का सीधा मतलब यह है कि वह अपने सर्वोच्च नेता की मौत को कोई आम मौत नहीं, बल्कि कर्बला जैसी महान शहादत के रूप में पेश कर रहा है।
काले और लाल रंग का खेल: शोक या महायुद्ध की चेतावनी?
तेहरान का वह पूरा परिसर जहां अयातुल्लाह खामेनेई का ताबूत रखा है, इस समय काले और लाल रंग के विशाल बैनरों और तस्वीरों से पटा हुआ है। शिया संस्कृति में इन रंगों का अपना एक अलग और बेहद आक्रामक महत्व है। जहां एक तरफ काले रंग के झंडे और बैनर गहरे शोक और दुख को दर्शाते हैं, वहीं दूसरी तरफ लाल रंग सीधे तौर पर ‘प्रतिशोध’ यानी बदले की भावना को जाहिर करता है। चूंकि ईरान अपने सुप्रीम लीडर की मौत के लिए अमेरिका और इजरायल के हमलों को जिम्मेदार मान रहा है, ऐसे में ताबूत पर लाल झंडा रखकर वह खुले तौर पर अपने दुश्मनों को यह संदेश दे रहा है कि इस मौत का बदला हर हाल में लिया जाएगा।
इराक के शहरों में जुलूस और ईरान का मास्टरस्ट्रोक
खामेनेई के अंतिम संस्कार से जुड़े ये कार्यक्रम 4 जुलाई से शुरू होकर 9 जुलाई तक चलेंगे। ईरान सरकार ने इस विदाई को और बड़ा रूप देने के लिए उनके अंतिम संस्कार के जुलूस को इराक के भी कई प्रमुख शिया बहुल शहरों से गुजारने का फैसला किया है। इसके बाद उन्हें उनके पैतृक शहर मशहद में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम और प्रतीकों के जरिए ईरान न केवल देश के भीतर राष्ट्रवाद को बढ़ा रहा है, बल्कि खुद को पूरे शिया जगत के इकलौते और सर्वमान्य नेता के रूप में स्थापित करने का बड़ा राजनीतिक दांव भी खेल रहा है।
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