कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु की रफ्तार जितनी तेज है, यहां का ट्रैफिक जाम भी उतना ही डरावना माना जाता है। लेकिन बीते दिनों ‘ओल्ड एयरपोर्ट रोड’ पर जो कुछ भी हुआ, उसने न सिर्फ वहां मौजूद लोगों को झकझोर कर रख दिया, बल्कि देश के वीआईपी (VIP) सिस्टम पर भी एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। आम दिनों की तरह ही गाड़ियां रेंग रही थीं, कि अचानक एक वीआईपी मूवमेंट के कारण पूरे ट्रैफिक को रोक दिया गया। गाड़ियों के हॉर्न और बढ़ती गर्मी के बीच, एक कार से उतरकर एक शख्स सीधे मुख्य सड़क के बीचों-बीच जाकर पालथी मारकर बैठ गया। पहली नजर में किसी को समझ नहीं आया कि यह कोई सिरफिरा है या कोई प्रदर्शनकारी, लेकिन जब उसने अपनी आपबीती चिल्लाकर बताई, तो वहां मौजूद ट्रैफिक पुलिसकर्मियों के पैरों तले जमीन खिसक गई और राहगीर भी हैरान रह गए।
भीषण जाम और कार के अंदर तड़पती जिंदगी
दरअसल, यह पूरा मामला कर्नाटक के महामहिम राज्यपाल के काफिले के गुजरने से जुड़ा था। सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत पुलिस ने चारों तरफ का रास्ता पूरी तरह ब्लॉक कर दिया था। इसी भारी जाम के बीच एक ऐसी कार भी फंसी थी, जिसमें एक बेहद मजबूर पति अपनी गर्भवती पत्नी को लेकर जा रहा था। काफी देर तक गाड़ियां टस से मस नहीं हुईं, तो कार के अंदर बंद महिला की तबीयत बिगड़ने लगी और वह दर्द से तड़पने लगी। पति ने बाहर मौजूद ट्रैफिक पुलिसकर्मियों से कई बार गुहार लगाई, अपनी पत्नी की नाजुक हालत का हवाला दिया और रास्ता देने की भीख मांगी। लेकिन नियमों और सुरक्षा के कड़े घेरे में बंधी पुलिस ने उसकी एक न सुनी। जब उस लाचार पति को लगा कि सिस्टम की जिद के आगे उसकी पत्नी और अजन्मे बच्चे की जान खतरे में पड़ सकती है, तो उसका सब्र का बांध टूट गया। उसने कानून हाथ में लेने या हिंसा करने के बजाय एक अनोखा और ऐतिहासिक ‘गांधीवादी’ तरीका अपनाया और सीधे वीआईपी के रास्ते में बैठ गया।
ऑन-ड्यूटी पुलिस से तीखी बहस और सिस्टम की बेबसी
एक आम नागरिक को इस तरह बीच सड़क पर धरने पर बैठा देख ट्रैफिक पुलिस के जवानों में हड़कंप मच गया। क्योंकि कुछ ही पलों में वहां से राज्यपाल का काफिला हाई-स्पीड में गुजरने वाला था। पुलिसकर्मी तुरंत उस शख्स को जबरन हटाने के लिए दौड़े। इस दौरान ऑन-ड्यूटी पुलिस और उस शख्स के बीच सड़क पर ही तीखी बहस शुरू हो गई। शख्स का एक ही तर्क था, “मेरी कार में प्रेग्नेंट पत्नी दर्द से परेशान है, अगर उसे कुछ हो गया तो जिम्मेदार कौन होगा? जब तक मेरी गाड़ी को रास्ता नहीं मिलेगा, मैं यहां से नहीं हटूंगा।” इस पूरी घटना का वीडियो वहां मौजूद किसी राहगीर ने अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर लिया, जो अब इंटरनेट पर आग की तरह फैल रहा है। हालांकि, काफी मान-मनौव्वल और सुरक्षा का हवाला देकर बाद में पुलिस ने उसे सड़क से हटाया, लेकिन इस घटना ने प्रशासन की संवेदनशीलता को पूरी तरह बेनकाब कर दिया।
वीआईपी कल्चर बनाम आम आदमी की जिंदगी का अधिकार
यह दर्दनाक वाकया कोई पहला मामला नहीं है। अभी कुछ ही समय पहले मुंबई से भी एक ऐसा ही वीडियो सामने आया था, जहां बीजेपी सरकार के मंत्री गिरीश महाजन के विरोध-प्रदर्शन के कारण एक बेबस मां अपने बच्चे को लाने के लिए घंटों जाम में फंसी रही और बाद में उसका गुस्सा फूट पड़ा था। बेंगलुरु की यह ताजा घटना सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद अब देश भर में इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है कि क्या किसी बड़े अधिकारी या राजनेता की सुरक्षा, एक गर्भवती महिला या गंभीर मरीज की जान से ज्यादा कीमती है? लोकतंत्र में जनता को जनार्दन कहा जाता है, लेकिन जब वही जनता वीआईपी कल्चर के कारण सड़कों पर तड़पने के लिए मजबूर हो जाती है, तो सिस्टम के खोखलेपन पर सवाल उठना लाजिमी है। लोगों का कहना है कि इमरजेंसी की स्थिति में कम से कम मेडिकल और प्रेगनेंसी से जुड़े मामलों के लिए ट्रैफिक नियमों में तुरंत छूट देने का कोई ठोस प्रावधान होना ही चाहिए।
