उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक भावुक कर देने वाली कहानी सामने आई है, जब करीब दो साल से लापता मूक-बधिर बालक आखिरकार अपने परिवार से मिल पाया। यह बालक सितंबर 2025 में मेरठ से लापता हुआ था और उसके परिजन लगातार उसकी तलाश कर रहे थे। बालक बोल और सुन नहीं सकता था, और अपना नाम या घर का पता भी सही से नहीं बता पा रहा था। प्रशासन के लिए उसकी पहचान करना चुनौतीपूर्ण था। बाल कल्याण समिति के आदेश पर बालक को लखनऊ के राजकीय बालगृह में रखा गया, जहां उसकी देखभाल शुरू हुई। प्रशासन ने सिर्फ बालक की देखभाल ही नहीं की, बल्कि परिवार तक पहुंचाने के लिए लगातार कोशिशें भी जारी रखीं।
‘आधार कार्ड बना पहेली का सबसे बड़ा सुराग’
बालक की पहचान का रास्ता तब खुला, जब उसका आधार कार्ड बनवाने की प्रक्रिया शुरू की गई। अधिकारियों ने बच्चे के फिंगरप्रिंट स्कैन किए और पहले से मौजूद आधार डाटा से मिलान किया। इसी प्रक्रिया में पता चला कि बालक पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के गंगासार गांव का रहने वाला है। आधार की मदद से परिवार से संपर्क किया गया और उन्हें बताया गया कि उनका बच्चा सुरक्षित है। परिजन तुरंत पश्चिम बंगाल से लखनऊ पहुंचे। बालक को देखकर उनके चेहरे पर खुशी और भावुकता साफ झलक रही थी। यह मिलन केवल एक पारिवारिक खुशी नहीं, बल्कि प्रशासन और तकनीक की मदद से संभव हुई एक बड़ी सफलता भी थी।
‘अधिकारियों की संवेदनशीलता और मेहनत’
इस पूरे मामले में लखनऊ बालगृह के अधिकारियों और बाल संरक्षण टीम की मेहनत और संवेदनशीलता की सराहना की जा रही है। बालक अपनी ओर से कोई जानकारी नहीं दे पा रहा था, लेकिन अधिकारियों ने हार नहीं मानी और उसके इशारों, व्यवहार और तकनीकी उपायों की मदद से लगातार प्रयास जारी रखे। उप मुख्य परिवीक्षा अधिकारी और मेरठ मंडल के उप निदेशक Puneet Mishra का भी इस प्रक्रिया में विशेष योगदान रहा। उनकी निरंतर फॉलो-अप और समर्पण की वजह से ही बालक आखिरकार अपने परिवार तक सुरक्षित पहुंच सका। यह घटना प्रशासन की मानवतावादी दृष्टि और धैर्य की मिसाल बनी।
‘तकनीक और संवेदनशीलता का संगम’
महिला कल्याण विभाग की निदेशक C. Indumati ने बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार बच्चों की सुरक्षा और संरक्षण के प्रति गंभीर है। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ प्रशासनिक सफलता नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनशीलता का उदाहरण है। इस प्रक्रिया में आधार कार्ड और बायोमेट्रिक पहचान तकनीक ने अहम भूमिका निभाई, लेकिन सबसे बड़ी ताकत अधिकारियों की लगातार कोशिश और संवेदनशीलता रही। दो साल बाद परिवार से मिलने के बाद बालक के चेहरे पर मुस्कान लौट आई और परिजन योगी सरकार और संबंधित अधिकारियों के आभारी हैं। यह घटना दिखाती है कि तकनीक और संवेदनशीलता के सही मेल से किसी भी मुश्किल केस को हल किया जा सकता है।
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