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बकरीद से पहले हाई कोर्ट का सख्त फैसला! महुआ मोइत्रा को झटका, गाय की कुर्बानी पर कोर्ट ने सुनाया बड़ा आदेश

कलकत्ता हाई कोर्ट ने बकरीद से पहले बड़ा फैसला सुनाते हुए गाय की कुर्बानी पर रोक को सही ठहराया। महुआ मोइत्रा की याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि इस्लाम में गाय कुर्बानी का अनिवार्य हिस्सा नहीं है।

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बकरीद से पहले पश्चिम बंगाल में गाय की कुर्बानी को लेकर चल रहे विवाद पर कलकत्ता हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि गाय इस्लामिक कुर्बानी की अनिवार्य परंपरा का हिस्सा नहीं है, इसलिए इसे धार्मिक अधिकार बताकर अनुमति नहीं मांगी जा सकती। इसी के साथ कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस सांसद Mahua Moitra की उस याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें राज्य सरकार द्वारा गोवंश की कुर्बानी पर लगाई गई रोक को चुनौती दी गई थी। अदालत की इस टिप्पणी के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया विवाद शुरू हो गया है। खास बात यह रही कि कोर्ट ने राज्य सरकार के पुराने कानून और जनहित को प्राथमिकता देते हुए साफ कर दिया कि सार्वजनिक व्यवस्था और सामाजिक संतुलन बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है।

‘गाय कुर्बानी का हिस्सा नहीं’, अदालत की अहम टिप्पणी

चीफ जस्टिस सुजॉय पॉल और जस्टिस पार्थ सारथी की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि इस्लाम में गाय की कुर्बानी को जरूरी धार्मिक परंपरा नहीं माना गया है। अदालत ने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार करीब 76 साल पहले इस संबंध में कानून बना चुकी है और वह अब भी प्रभावी है। इसलिए अदालत को सरकार के फैसले में दखल देने की आवश्यकता नहीं दिखती। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार के पास यह अधिकार है कि वह जनहित और कानून-व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए पशु वध पर नियंत्रण या सीमाएं तय कर सके। अदालत ने खुले स्थानों और सार्वजनिक इलाकों में कुर्बानी पर भी सख्त रुख अपनाया और निर्देश दिया कि पशु वध केवल तय और सुरक्षित स्थानों पर ही होना चाहिए। यदि कोई नियमों का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए।

काली पूजा और पशु बलि पर भी कोर्ट ने दिया संतुलित फैसला

सुनवाई के दौरान अदालत के सामने मंदिरों में होने वाली पशु बलि से जुड़ी याचिकाएं भी रखी गईं। याचिकाकर्ताओं ने काली पूजा जैसे आयोजनों में सामूहिक पशु बलि पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। हालांकि हाई कोर्ट ने इस मांग को भी खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि धार्मिक परंपराओं पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाना सही नहीं होगा और इसे देश को पूरी तरह शाकाहारी बनाने की सोच से नहीं देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने यह जरूर कहा कि सभी धार्मिक आयोजनों में कानून और प्रशासनिक नियमों का पालन अनिवार्य रहेगा। अदालत के इस संतुलित फैसले को कई लोग धार्मिक स्वतंत्रता और कानून व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं। वहीं राजनीतिक दलों ने भी फैसले को अपने-अपने नजरिए से पेश करना शुरू कर दिया है।

बकरीद से पहले बंगाल की राजनीति में बढ़ी हलचल

बकरीद से ठीक पहले आए इस फैसले ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को गर्म कर दिया है। राज्य सरकार पहले ही आदेश जारी कर चुकी है कि कुर्बानी के लिए इस्तेमाल होने वाले पशु की उम्र 14 साल से कम नहीं होनी चाहिए। साथ ही पशु दुधारू या बीमार नहीं होना चाहिए और मेडिकल जांच के बाद ही अनुमति दी जाएगी। प्रशासन ने अधिकारियों से प्रमाणपत्र लेना भी जरूरी किया है। इसी आदेश के खिलाफ महुआ मोइत्रा अदालत पहुंची थीं, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिल सकी। दूसरी तरफ बीजेपी ने इसे कानून और परंपरा की जीत बताया है, जबकि तृणमूल कांग्रेस के भीतर इस फैसले को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। बकरीद से पहले हाई कोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि राज्य में धार्मिक आयोजन कानून के दायरे में ही होंगे और प्रशासनिक नियमों का पालन हर हाल में करना पड़ेगा।

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