उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। राज्य में पंचायत चुनाव तय समय पर होंगे या टल जाएंगे, इसको लेकर अब सस्पेंस बढ़ गया है। पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने बताया कि सरकार को दो प्रस्ताव भेजे गए हैं। पहले प्रस्ताव में ग्राम प्रधानों, ब्लॉक प्रमुखों और जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल बढ़ाने की बात कही गई है। वहीं दूसरे प्रस्ताव में पंचायतों में प्रशासक नियुक्त करने का सुझाव दिया गया है। अब सरकार जिस प्रस्ताव को मंजूरी देगी, उसी के आधार पर आगे फैसला लिया जाएगा। इस खबर के सामने आने के बाद प्रदेश की पंचायत राजनीति में हलचल तेज हो गई है।
26 मई के बाद क्या होगा?
प्रदेश में ग्राम प्रधानों और पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल 26 मई तक माना जा रहा है। इसके बाद पंचायतों का काम कैसे चलेगा, इसे लेकर चर्चा शुरू हो गई है। नियम के मुताबिक सरकार चाहे तो प्रशासक समिति बनाकर मौजूदा प्रधानों और पंचायत सदस्यों को कुछ समय तक जिम्मेदारी दे सकती है। दूसरा रास्ता यह है कि सरकार सीधे अधिकारियों को प्रशासक बनाकर पंचायतों का काम संभालने की जिम्मेदारी दे दे। फिलहाल माना जा रहा है कि सरकार मौजूदा प्रतिनिधियों को कुछ समय और मौका दे सकती है ताकि पंचायतों का काम प्रभावित न हो।
ओबीसी आयोग के कारण बढ़ सकती है देरी
पंचायत चुनाव में देरी की सबसे बड़ी वजह ओबीसी आरक्षण को माना जा रहा है। सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग बनाने का फैसला लिया है। यह आयोग पिछड़े वर्ग की स्थिति का सर्वे करेगा और उसी के आधार पर आरक्षण तय होगा। इस पूरी प्रक्रिया में समय लग सकता है। इसी वजह से पंचायत चुनाव आगे खिसकने की संभावना बढ़ गई है। सरकार चाहती है कि चुनाव से पहले सभी कानूनी और प्रशासनिक तैयारियां पूरी हो जाएं ताकि बाद में कोई विवाद न हो।
मतदाता सूची और कोर्ट केस भी बड़ी वजह
राज्य निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूची जारी करने की तारीख फिर बढ़ाकर 10 जून कर दी है। इसके अलावा प्रदेश में जातीय जनगणना का काम भी चल रहा है। ऐसे में प्रशासन पर काम का दबाव बढ़ गया है। पंचायत चुनाव से जुड़ा मामला अदालत में भी चल रहा है। इसलिए सरकार अभी कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहती। माना जा रहा है कि अदालत के फैसले और आरक्षण प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही पंचायत चुनाव की नई तारीख तय होगी। फिलहाल प्रधानों और पंचायत प्रतिनिधियों की नजर सरकार के अगले फैसले पर टिकी हुई है।
