देशभर में मेडिकल स्टोर संचालकों की हड़ताल ने आम लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। फार्मासिस्ट, केमिस्ट और दवा डिस्ट्रीब्यूटरों के संगठन ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट (AIOCD) ने दवाखानों को बंद रखने का आह्वान किया है। संगठन का आरोप है कि ऑनलाइन फार्मेसी कंपनियों को सरकार की ओर से ज्यादा छूट दी जा रही है, जिससे छोटे मेडिकल स्टोर का कारोबार प्रभावित हो रहा है। दिल्ली समेत कई बड़े शहरों में इसका असर साफ दिखाई दिया। राजधानी में करीब 15 हजार मेडिकल स्टोर हैं, जबकि देशभर में इनकी संख्या 7 से 8 लाख के बीच बताई जा रही है। हालांकि कुछ राज्यों में स्थानीय संगठनों ने हड़ताल वापस ले ली, लेकिन दिल्ली-NCR में कई इलाकों में दवा खरीदने पहुंचे लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा। सबसे ज्यादा चिंता उन मरीजों को हुई जो रोजाना की दवाओं पर निर्भर हैं। कई जगह लोगों ने पहले से दवाएं जमा कर ली थीं, जिससे कुछ दुकानों पर भीड़ भी देखने को मिली।
अब ट्रांसपोर्टरों का चक्काजाम, दिल्ली-NCR में सप्लाई पर बढ़ी चिंता
दवा दुकानों की हड़ताल के बीच अब ट्रांसपोर्ट यूनियन ने 21 से 23 मई तक दिल्ली-NCR में तीन दिन के चक्काजाम का ऐलान कर दिया है। ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस (AIMTC) और उससे जुड़े संगठन दिल्ली सरकार की नई ग्रीन टैक्स नीति के विरोध में सड़क पर उतर रहे हैं। ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि पहले से बढ़ते पेट्रोल-डीजल के दामों ने उनकी कमर तोड़ दी है, ऊपर से ग्रीन टैक्स बढ़ाकर कारोबार को और मुश्किल बना दिया गया है। हल्के कमर्शियल वाहनों पर ग्रीन टैक्स 1800 रुपये से बढ़ाकर 2400 रुपये और भारी वाहनों पर 2 हजार से बढ़ाकर 4 हजार रुपये कर दिया गया है। ट्रांसपोर्ट यूनियन का दावा है कि 1 अप्रैल से अब तक सरकार इस टैक्स से 93 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई कर चुकी है, लेकिन ट्रांसपोर्ट सेक्टर को कोई राहत नहीं मिली। यूनियन ने यह भी आरोप लगाया कि खाली ट्रकों से भी ग्रीन टैक्स लिया जा रहा है, जबकि ऐसा नियम केवल दिल्ली से गुजरने वाले वाहनों के लिए होना चाहिए था।
कारोबार, मंडियों और बाजारों पर दिख सकता है असर
दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद और गुरुग्राम जैसे बड़े कारोबारी इलाकों में ट्रकों और कमर्शियल वाहनों की आवाजाही कम होने का असर बाजारों पर पड़ सकता है। हालांकि ट्रांसपोर्ट यूनियन ने साफ किया है कि आवश्यक वस्तुओं को चक्काजाम से बाहर रखा जाएगा, लेकिन इसके बावजूद सब्जियों, फल, निर्माण सामग्री और छोटे उद्योगों की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है। दिल्ली-NCR में करीब 68 ट्रांसपोर्ट संगठन इस आंदोलन में शामिल बताए जा रहे हैं। AIMTC के तहत ट्रक ऑपरेटरों के साथ-साथ टैक्सी, प्राइवेट बस और मैक्सी कैब यूनियन भी जुड़ी हुई हैं। व्यापारियों का कहना है कि अगर हड़ताल लंबी चली तो बाजारों में सामान की कीमतों पर असर दिख सकता है। कई छोटे कारोबारी पहले ही आर्थिक दबाव झेल रहे हैं और अब ट्रांसपोर्ट रुकने से उन्हें नुकसान का डर सता रहा है। दूसरी ओर, आम लोग भी आने वाले दिनों में ट्रैफिक और सामान की सप्लाई में दिक्कत को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं।
ट्रांसपोर्टरों की सरकार से क्या हैं बड़ी मांगें?
ट्रांसपोर्ट यूनियन ने दिल्ली सरकार और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) के सामने कई मांगें रखी हैं। उनकी पहली मांग है कि दिल्ली आने वाले भारी कमर्शियल वाहनों पर लगाया गया ग्रीन टैक्स तुरंत वापस लिया जाए। इसके अलावा दिल्ली से बाहर पंजीकृत बीएस-4 कमर्शियल वाहनों पर 1 नवंबर से लागू होने वाली एंट्री बैन को हटाने की भी मांग की गई है। यूनियन का कहना है कि जो वाहन केवल दिल्ली से गुजरते हैं, उन्हीं पर ईसीसी ग्रीन टैक्स लगाया जाना चाहिए। साथ ही आवश्यक वस्तुओं से जुड़े बीएस-6 वाहनों को ग्रीन टैक्स से पूरी तरह छूट देने की मांग भी की गई है। ट्रांसपोर्टरों का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद एमसीडी टोल बैरियर अब भी काम कर रहे हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ रहा है। अब सबकी नजर सरकार और ट्रांसपोर्ट यूनियन के बीच होने वाली बातचीत पर टिकी है। अगर जल्द समाधान नहीं निकला तो दिल्ली-NCR में आने वाले दिनों में कारोबार, ट्रांसपोर्ट और आम जिंदगी पर बड़ा असर देखने को मिल सकता है।
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