भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चल रहे सिंधु जल संधि विवाद में एक बार फिर बड़ा मोड़ आ गया है। इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने शुक्रवार को सिंधु नदी के पानी और भारत के बांध परियोजनाओं से जुड़े मामले में फैसला सुनाया, लेकिन भारत ने इसे तुरंत खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साफ कहा कि भारत इस तथाकथित अदालत को कभी वैध नहीं मानता और इसके सभी फैसले पूरी तरह शून्य हैं। भारत का कहना है कि यह कोर्ट संधि के नियमों के खिलाफ बनायी गई है, इसलिए इसके किसी भी आदेश का भारत पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इस बयान के बाद पाकिस्तान को बड़ा कूटनीतिक झटका माना जा रहा है।
1960 की संधि अब क्यों बनी विवाद की वजह?
सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी, जिसमें विश्व बैंक भी गवाह के रूप में शामिल था। इस समझौते के तहत रावी, ब्यास और सतलज नदियों का अधिकार भारत को मिला था, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब का पानी पाकिस्तान के हिस्से में गया। दशकों तक यह संधि दोनों देशों के बीच पानी बांटने का आधार बनी रही। हालांकि समय के साथ पाकिस्तान ने कई बार भारत की जल परियोजनाओं पर सवाल उठाए। पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत ने इस संधि को लेकर अपना रुख और सख्त कर लिया। इसके बाद पाकिस्तान में पानी को लेकर चिंता बढ़ने लगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि सिंधु का पानी पाकिस्तान की खेती और अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है, इसलिए हर फैसला वहां राजनीतिक और आर्थिक हलचल पैदा करता है।
किशनगंगा और रातले परियोजना पर बढ़ा विवाद
पूरा विवाद जम्मू-कश्मीर में बन रही दो बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर शुरू हुआ। पहली किशनगंगा परियोजना झेलम नदी पर और दूसरी रातले परियोजना चिनाब नदी पर बनाई जा रही है। पाकिस्तान का आरोप है कि इन बांधों के डिजाइन से पानी के प्रवाह पर असर पड़ सकता है और यह संधि के नियमों के खिलाफ है। दूसरी तरफ भारत लगातार कहता रहा है कि दोनों परियोजनाएं संधि के नियमों के अनुसार हैं और इनसे पाकिस्तान के हिस्से के पानी पर कोई असर नहीं पड़ेगा। भारत का यह भी कहना है कि पाकिस्तान हर तकनीकी मामले को राजनीतिक रंग देकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाने की कोशिश करता है। इसी कारण यह मामला लगातार दोनों देशों के बीच तनाव का कारण बना हुआ है।
वर्ल्ड बैंक की भूमिका पर भी उठे सवाल
पाकिस्तान ने साल 2016 में विश्व बैंक से हस्तक्षेप की मांग की थी और कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन बनाने की अपील की थी। भारत चाहता था कि विवाद का समाधान संधि में मौजूद ‘न्यूट्रल एक्सपर्ट’ प्रक्रिया से किया जाए। लेकिन 2022 में विश्व बैंक ने एक साथ न्यूट्रल एक्सपर्ट और आर्बिट्रेशन कोर्ट दोनों की प्रक्रिया शुरू कर दी। भारत ने तभी इसका विरोध किया था और कहा था कि यह संधि की मूल भावना के खिलाफ है। अब हालिया फैसले के बाद भारत ने फिर दोहराया है कि वह केवल वैध और संधि के अनुरूप प्रक्रिया को ही मानेगा। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और गर्मा सकता है, जबकि पाकिस्तान लगातार भारत पर दबाव बनाने की कोशिश करेगा।
