20 रुपये प्रति किलोमीटर भुगतान की बड़ी मांग
गिग वर्कर्स यूनियन ने कंपनियों के सामने सबसे बड़ी मांग प्रति किलोमीटर न्यूनतम 20 रुपये भुगतान तय करने की रखी है। यूनियन का कहना है कि पेट्रोल महंगा होने के बाद भी कंपनियों की ओर से डिलीवरी चार्ज या इंसेंटिव में कोई खास बदलाव नहीं किया गया। इससे वर्कर्स की जेब पर सीधा असर पड़ रहा है। यूनियन की अध्यक्ष सीमा सिंह ने कहा कि भीषण गर्मी में घंटों सड़क पर काम करने वाले डिलीवरी पार्टनर्स पहले से ही मानसिक और आर्थिक दबाव झेल रहे हैं। ऊपर से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने से उनकी स्थिति और कठिन हो गई है। उन्होंने साफ कहा कि अगर कंपनियों ने जल्द कोई सकारात्मक फैसला नहीं लिया तो आने वाले दिनों में आंदोलन और बड़ा रूप ले सकता है। यूनियन का दावा है कि कई शहरों में हजारों वर्कर्स इस विरोध में शामिल होंगे और ऐप लॉगआउट कर अपनी नाराजगी दर्ज कराएंगे।
1 करोड़ से ज्यादा वर्कर्स की कमाई पर असर
यूनियन के राष्ट्रीय समन्वयक निर्मल गोराना के मुताबिक देश में करीब 1 करोड़ 20 लाख लोग गिग और प्लेटफॉर्म आधारित सेवाओं से जुड़े हुए हैं। इनमें फूड डिलीवरी, ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स, ग्रॉसरी सप्लाई और कैब सर्विस में काम करने वाले लोग शामिल हैं। इन वर्कर्स की कमाई का बड़ा हिस्सा ईंधन और गाड़ी के रखरखाव में खर्च हो जाता है। पेट्रोल-डीजल महंगा होने के बाद उनकी वास्तविक आय लगातार कम हो रही है। कई डिलीवरी एजेंट्स का कहना है कि पहले जहां एक दिन में ठीक-ठाक बचत हो जाती थी, वहीं अब खर्च निकालना भी मुश्किल हो रहा है। कुछ वर्कर्स ने यह भी आरोप लगाया कि कंपनियां इंसेंटिव मॉडल बदलकर कमाई को और घटा रही हैं। ऐसे में विरोध प्रदर्शन को लेकर गिग सेक्टर में तेजी से समर्थन बढ़ रहा है। यूनियन का कहना है कि यह सिर्फ वेतन का मुद्दा नहीं बल्कि लाखों परिवारों की रोजी-रोटी का सवाल है।
सरकार और कंपनियों पर बढ़ा दबाव
गिग वर्कर्स यूनियन ने केंद्र और राज्य सरकारों से भी हस्तक्षेप की मांग की है। यूनियन चाहती है कि सरकार ऐप आधारित कंपनियों के लिए ऐसे दिशा-निर्देश जारी करे, जिससे बढ़ती ईंधन लागत का पूरा बोझ कर्मचारियों पर न पड़े। यूनियन नेताओं का कहना है कि ऐप कंपनियां करोड़ों का कारोबार कर रही हैं, लेकिन डिलीवरी और कैब सर्विस चलाने वाले वर्कर्स को पर्याप्त सुरक्षा और आर्थिक सहायता नहीं मिल रही। शुक्रवार को होने वाले विरोध प्रदर्शन को फिलहाल शांतिपूर्ण बताया गया है, लेकिन यूनियन ने साफ संकेत दिए हैं कि मांगें नहीं मानी गईं तो आगे देशव्यापी बड़ा आंदोलन हो सकता है। दूसरी तरफ आम लोगों को भी इस हड़ताल का असर झेलना पड़ सकता है, क्योंकि कई शहरों में फूड डिलीवरी और कैब बुकिंग सेवाएं धीमी पड़ने की आशंका जताई जा रही है। अब नजर कंपनियों और सरकार की प्रतिक्रिया पर टिकी है कि वे इस बढ़ते असंतोष को कैसे संभालते हैं।
