दोपहर और शाम का मुहूर्त कामकाजी महिलाओं के लिए राहत
जो महिलाएं सुबह पूजा नहीं कर पाएंगी, उनके लिए दोपहर और शाम के शुभ समय बेहद खास माने जा रहे हैं। विजय मुहूर्त दोपहर 02:04 बजे से 03:28 बजे तक रहेगा। कई महिलाएं इस दौरान ऑफिस के पास मौजूद वट वृक्ष पर पूजा कर सकती हैं। वहीं शाम को गोधूलि मुहूर्त 07:04 बजे से 07:25 बजे तक रहेगा, जो घर लौटने के बाद पूजा के लिए अच्छा समय माना जा रहा है। इसके अलावा देर रात पूजा करने वालों के लिए निशिता मुहूर्त 11:57 बजे से 12:38 बजे तक रहेगा। धार्मिक मान्यता है कि वट वृक्ष में भगवान शिव का वास होता है और इसकी पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि आती है। मान्यता के अनुसार देवी सावित्री ने इसी दिन यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। कहा जाता है कि उन्होंने वट वृक्ष के नीचे बैठकर तप और संकल्प से अपने पति को नया जीवन दिलाया था। यही वजह है कि यह व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है।
इस बार शनि अमावस्या का भी बन रहा खास संयोग
वट सावित्री व्रत 2026 इस बार इसलिए भी विशेष माना जा रहा है क्योंकि इसी दिन शनिश्चरी अमावस्या का दुर्लभ संयोग बन रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनिवार को पड़ने वाली अमावस्या शनि दोष और पितृ दोष से राहत दिलाने वाली मानी जाती है। ज्योतिष के जानकार बताते हैं कि इस दिन वट वृक्ष की पूजा के साथ शनि देव से जुड़े उपाय करना भी बेहद लाभकारी रहेगा। महिलाएं पूजा के बाद गरीबों को दान कर सकती हैं, काले तिल, उड़द और सरसों का तेल दान करना शुभ माना जाता है। वहीं पीपल और वट वृक्ष के नीचे दीपक जलाने से भी सकारात्मक फल मिलने की मान्यता है। इस विशेष संयोग के कारण कई लोग इसे साल का बेहद प्रभावशाली धार्मिक दिन मान रहे हैं। ऐसे में जो महिलाएं ऑफिस या कामकाज में व्यस्त रहेंगी, वे भी किसी भी शुभ मुहूर्त में श्रद्धा से पूजा करके व्रत का पूरा फल प्राप्त कर सकती हैं।
जानिए वट सावित्री व्रत की आसान पूजा विधि
वट सावित्री व्रत की पूजा विधि बेहद सरल मानी जाती है। सुबह स्नान के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है। महिलाएं इस दिन लाल, पीले या हरे रंग के वस्त्र पहनती हैं, जिन्हें शुभ माना जाता है। पूरे दिन निर्जला व्रत रखने की परंपरा है, हालांकि स्वास्थ्य कारणों से फल और दूध लिया जा सकता है। शुभ मुहूर्त में वट वृक्ष के नीचे माता सावित्री और सत्यवान की तस्वीर स्थापित की जाती है। इसके बाद जल अर्पित कर फल, फूल, मिठाई और सुहाग की सामग्री चढ़ाई जाती है। महिलाएं कच्चा सूत लेकर वट वृक्ष की सात परिक्रमा करती हैं और तने पर धागा बांधती हैं। पूजा के दौरान वट सावित्री व्रत कथा सुनना और चने हाथ में लेकर संकल्प करना शुभ माना जाता है। अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त में पूजा के बाद व्रत का पारण किया जाता है। मान्यता है कि श्रद्धा और विश्वास से किया गया यह व्रत परिवार में सुख, शांति और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद देता है।
