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आसमान में मौत: 331 यात्री और 13 घंटे तक साथ उड़ती रही ‘लाश’, पायलट ने आखिर क्यों नहीं मोड़ा विमान?

ब्रिटिश एयरवेज की फ्लाइट में एक महिला की मौत के बाद 13 घंटे तक शव के साथ सफर जारी रहा। जानें विमानन क्षेत्र के वो कड़े नियम, जिनकी वजह से पायलट ने इमरजेंसी लैंडिंग नहीं की।

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हांगकांग से लंदन की ओर जा रहे ब्रिटिश एयरवेज के विमान BA32 में सफर कर रहे यात्रियों के लिए वह सफर किसी डरावने अनुभव से कम नहीं था। करीब 30 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ रहे इस एयरबस A350-1000 में सवार 331 यात्रियों को तब गहरा सदमा लगा, जब उन्हें पता चला कि उनके बीच मौजूद एक 60 वर्षीय महिला अब इस दुनिया में नहीं रही। मौत की पुष्टि होने के बावजूद, विमान अपने तय रास्ते पर उड़ता रहा और करीब साढ़े तेरह घंटे बाद लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर उतरा। इस घटना ने एक तरफ जहां मानवीय संवेदनाओं को झकझोर दिया है, वहीं दूसरी तरफ एयरलाइंस के उन सख्त प्रोटोकॉल को चर्चा में ला दिया है, जो आम जनता की समझ से परे हैं।

मौत के बाद ‘इमरजेंसी’ खत्म: पायलट के फैसले के पीछे का तर्क

ज्यादातर लोग यह सोच सकते हैं कि विमान में किसी की मौत होने पर उसे तुरंत लैंड करा देना चाहिए, लेकिन विमानन जगत के नियम बेहद व्यावहारिक और तकनीकी हैं। दरअसल, पायलट किसी भी विमान को ‘मेडिकल इमरजेंसी’ की स्थिति में तभी डायवर्ट करता है, जब यात्री की जान बचाने की थोड़ी भी गुंजाइश हो। यदि फ्लाइट में मौजूद डॉक्टर या प्रशिक्षित क्रू यह प्रमाणित कर दे कि यात्री की मृत्यु हो चुकी है, तो उसे अब ‘इमरजेंसी’ नहीं माना जाता। पायलट का तर्क सीधा होता है—लैंडिंग का उद्देश्य जीवन बचाना है, और चूंकि व्यक्ति अब जीवित नहीं है, इसलिए सैकड़ों अन्य यात्रियों को परेशानी में डालना या किसी अनजान देश में विमान उतारना तार्किक नहीं माना जाता। इसी नियम के तहत, ब्रिटिश एयरवेज के पायलट ने उड़ान जारी रखने का फैसला लिया।

शव के साथ 13 घंटे का सफर: कहां और कैसे रखा गया मृतक को?

विमान के भीतर किसी शव को संभालना क्रू के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है। ब्रिटिश एयरवेज की इस फ्लाइट में जगह की भारी कमी थी। शुरुआत में शव को उसकी सीट पर ही रखने या गलियारे (Aisle) में ले जाने पर विचार हुआ, लेकिन अन्य यात्रियों की मानसिक स्थिति और आवाजाही को देखते हुए इसे टाल दिया गया। अंत में, शव को सम्मानपूर्वक चादर में लपेटकर विमान के पिछले हिस्से यानी गैलरी एरिया (जहां क्रू का काम होता है) में रखा गया। अंतरराष्ट्रीय नियमों के मुताबिक, शव को ऐसी जगह रखा जाना चाहिए जहां वह यात्रियों की नजरों से ओझल रहे। कुछ बड़े विमानों में विशेष ‘कॉर्प्स कपबोर्ड’ (शव रखने की जगह) होती है, लेकिन सुविधा के अभाव में गैलरी या खाली सीटों का ही सहारा लिया जाता है।

आसमान के नियम और एयरलाइंस की मजबूरियां

इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (IATA) के दिशा-निर्देश स्पष्ट करते हैं कि बिना किसी ‘लाइफ-सेविंग’ कारण के विमान को मोड़ना एयरलाइंस के लिए बहुत महंगा सौदा होता है। एक इमरजेंसी लैंडिंग में लाखों लीटर ईंधन की बर्बादी, भारी लैंडिंग शुल्क और अन्य कनेक्टिंग उड़ानों का शेड्यूल बिगड़ने जैसे वित्तीय जोखिम शामिल होते हैं। तकनीकी रूप से पायलट का निर्णय सही था, क्योंकि गंतव्य तक पहुंचने में ही कानूनी और कागजी कार्रवाई आसान होती है। हालांकि, इस घटना ने यात्रियों के बीच सुरक्षा और नैतिकता की बहस छेड़ दी है कि क्या एक शव के साथ घंटों सफर करना बाकी यात्रियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए उचित है? फिलहाल, हीथ्रो एयरपोर्ट पर लैंडिंग के बाद ही शव को कानूनी प्रक्रिया के तहत अधिकारियों को सौंपा गया।

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