नक्सलवाद: कभी जिसे भारत की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती कहा जाता था, वही लाल गलियारा आज इतिहास बनने की दहलीज़ पर खड़ा नजर आ रहा है. जिन जंगलों में एक समय सुरक्षा बलों का जाना भी मौत को न्योता देने जैसा माना जाता था, वहां अब सन्नाटा है—लेकिन यह सन्नाटा डर का नहीं, बदलाव का है. नक्सलियों की बंदूकें खामोश हो रही हैं, उनके ठिकाने खाली हो चुके हैं और ग्रामीण इलाकों में फिर से सामान्य जीवन की उम्मीद जागी है. जिन रास्तों पर पहले आईईडी और घात का खतरा रहता था, वहां अब विकास कार्यों की गाड़ियां दौड़ रही हैं. यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि वर्षों की रणनीति, लगातार अभियान और स्थानीय लोगों के भरोसे का नतीजा है.
सरकार की डेडलाइन और ज़मीनी हकीकत
साल 2024 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जब यह कहा था कि 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद का सफाया कर दिया जाएगा, तब कई लोगों ने इसे सिर्फ एक राजनीतिक बयान माना. लेकिन बीते महीनों में ज़मीनी हालात ने इस बयान को एक ठोस लक्ष्य में बदल दिया. डेडलाइन से लगभग चार महीने पहले ही रेड कॉरिडोर के दो राज्यों ने खुद को नक्सल मुक्त घोषित कर दिया. यह सिर्फ आंकड़ों की जीत नहीं, बल्कि उस डर पर विजय है जो दशकों से इन इलाकों में पसरा हुआ था. पुलिस कैंप, सड़कें, मोबाइल टावर और स्कूल—जो कभी नक्सलियों के निशाने पर रहते थे—आज तेजी से खड़े हो रहे हैं. यह संकेत है कि सरकार की नीति अब सिर्फ ऑपरेशन तक सीमित नहीं, बल्कि स्थायी शांति की ओर बढ़ रही है.
एमएमसी ज़ोन में ढहती नक्सली कमान
मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के जंक्शन इलाके में फैला एमएमसी ज़ोन कभी नक्सलियों की मजबूत रीढ़ माना जाता था. यहां बड़े कमांडर समानांतर सरकार चलाते थे, टैक्स वसूलते थे और फरमान जारी होते थे. लेकिन हालात अब पूरी तरह बदल चुके हैं. रामधेर और अनंत जैसे बड़े नामों के सरेंडर के बाद पूरे ज़ोन में सिर्फ छह नक्सली बचे होने की बात सामने आई. इनमें सबसे बड़ा नाम छोटा दीपक था, लेकिन उसके दबाव में आते ही बालाघाट में दीपक उइके और रोहित ने भी हथियार डाल दिए. यह सिलसिला दिखाता है कि नक्सली संगठन की कमान टूट चुकी है, नेतृत्व बिखर गया है और अब जंगलों में उनका नेटवर्क पहले जैसा नहीं रहा.
42 दिन, 42 सरेंडर और नई शुरुआत
सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा बीते 42 दिनों का है, जब एमएमसी ज़ोन में 7 करोड़ 75 लाख रुपये के इनामी 42 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर दिया. ये वही लोग थे जो कभी जंगलों में कानून से ऊपर खुद को समझते थे. आत्मसमर्पण के पीछे सिर्फ सुरक्षा बलों का दबाव नहीं, बल्कि पुनर्वास नीति, संवाद और भविष्य की उम्मीद भी है. जो युवा कभी हथियार उठाने को मजबूर हुए थे, अब वे मुख्यधारा में लौटने की राह चुन रहे हैं. स्थानीय लोग भी खुलकर सामने आ रहे हैं और विकास कार्यों में भागीदारी बढ़ रही है. यह साफ संकेत है कि नक्सलवाद अब केवल कमजोर नहीं पड़ा, बल्कि अपने अंतिम दौर में प्रवेश कर चुका है—जहां डर की जगह विश्वास और हिंसा की जगह विकास ले रहा है.
