पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव उस वक्त और बढ़ गया जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने तालिबान शासन को खुली चेतावनी देते हुए कहा कि अगर TTP पर तुरंत कार्रवाई नहीं की गई, तो पाकिस्तान “सत्ता परिवर्तन” का समर्थन करने पर भी विचार कर सकता है। पाकिस्तान का आरोप है कि TTP के आतंकी अफगानिस्तान में सुरक्षित ठिकानों से पाकिस्तान पर हमले कर रहे हैं, और तालिबान सरकार इसे रोकने के लिए इच्छुक नहीं दिख रही।
यह बयान पड़ोसी देशों के बीच पहले से मौजूद अविश्वास को और गहरा करने वाला है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि यह अल्टीमेटम क्षेत्र की भू-राजनीति को झकझोर सकता है।
तालिबान का सख्त जवाब
तालिबान सरकार ने पाकिस्तान के बयान को सीधे-सीधे अफगानिस्तान की संप्रभुता पर हमला बताया है। उन्होंने कहा कि “अफगानिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र है, और हम अपने शासन में किसी भी बाहरी दखल को स्वीकार नहीं करेंगे।”
तालिबान का दावा है कि TTP उनके नियंत्रण में नहीं है, जबकि पाकिस्तान लगातार कहता है कि आतंकी संगठन को अफगानिस्तान में पनाह मिल रही है। यही विवाद पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव को और अधिक खतरनाक चरण में ले जा रहा है।
सीमा पर सेना बढ़ी
तनाव सिर्फ राजनीतिक बयानों तक सीमित नहीं रहा। हाल के महीनों में चमन और तोरखम बॉर्डर पर कई बार गोलीबारी, व्यापार रुकने और यात्रियों के फंसने जैसी घटनाएं सामने आई हैं। पाकिस्तान ने वीजा और व्यापार नियमों को कड़ा किया, जिससे अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ा।
सीमा पर दोनों देशों की सेनाओं की मौजूदगी बढ़ने से स्थिति और संवेदनशील हो गई है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव नियंत्रित नहीं हुआ, तो यह किसी बड़े संघर्ष की राह खोल सकता है।
क्या सत्ता परिवर्तन का संकेत सच होगा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पाकिस्तान वास्तव में अफगानिस्तान में शासन परिवर्तन का समर्थन करेगा? ऐसा कदम पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। अमेरिका, चीन, ईरान और रूस जैसे देशों की नजर इस मुद्दे पर टिकी है ल। पाकिस्तान-अफगानिस्तान तनाव ने दक्षिण एशिया की सुरक्षा को सीधे प्रभावित करना शुरू कर दिया है। आने वाले हफ्ते यह तय करेंगे कि रिश्ते संवाद की ओर बढ़ेंगे या किसी बड़े भू-राजनीतिक तूफान की तरफ।
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