तेलंगाना के एक छोटे से गांव लक्ष्मीपुरम में रहने वाले 80 वर्षीय नक्का इंद्रय्या की कहानी इन दिनों लोगों को हैरान भी कर रही है और सोचने पर भी मजबूर कर रही है। आमतौर पर लोग मौत का नाम सुनते ही डर जाते हैं, लेकिन इंद्रय्या ने मौत को न सिर्फ स्वीकार किया बल्कि उससे दोस्ती भी कर ली थी। उन्होंने जीते-जी अपनी कब्र खुदवा ली थी, वो भी किसी डर या मजबूरी में नहीं, बल्कि बेहद शांत और व्यावहारिक सोच के साथ। इंद्रय्या का मानना था कि इंसान को अपनी मृत्यु के बारे में भी उतनी ही सहजता से सोचना चाहिए जितनी सहजता से वह जीवन जीता है। इसी सोच के तहत उन्होंने अपनी पत्नी की कब्र के पास ही अपनी कब्र तैयार करवाई और इसे अपने जीवन का अंतिम पड़ाव मान लिया। गांव में शुरुआत में लोग इस फैसले को अजीब मानते थे, लेकिन समय के साथ यह कब्र खुद इंद्रय्या की सोच और दर्शन का प्रतीक बन गई।
रोज़ झाड़ू, पौधों की देखभाल और आत्मचिंतन
इंद्रय्या की दिनचर्या में एक अनोखी आदत शामिल थी, जो उन्हें बाकी लोगों से बिल्कुल अलग बनाती थी। वह रोज़ अपनी बनाई हुई कब्र पर जाते थे, वहां झाड़ू लगाते, आसपास की सफाई करते और पौधों को पानी देते थे। वह उस जगह को सिर्फ कब्र नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का स्थान मानते थे। कब्र के पास उन्होंने एक पट्टिका भी लगवाई थी, जिस पर जीवन और मृत्यु के सत्य को दर्शाने वाला संदेश लिखा था। गांव के लोग बताते हैं कि इंद्रय्या अक्सर वहां शांत बैठकर सोच में डूबे रहते थे, मानो जीवन के हर पल को गहराई से समझ रहे हों। उनका कहना था कि जब इंसान मौत को स्वीकार कर लेता है, तब वह जीवन को और बेहतर तरीके से जी पाता है। इस सोच ने उन्हें भीतर से बेहद शांत और संतुलित इंसान बना दिया था, जिसकी झलक उनके व्यवहार और बातों में साफ दिखाई देती थी।
गांव, परिवार और दानशील जीवन
इंद्रय्या सिर्फ अपनी कब्र की वजह से ही नहीं, बल्कि अपने सामाजिक कार्यों के लिए भी जाने जाते थे। उनके बड़े भाई और गांव के लोगों के मुताबिक, उन्होंने अपने जीवनकाल में गांव के लिए कई अच्छे काम किए। उन्होंने एक चर्च बनवाया, जरूरतमंदों की मदद की और अपनी संपत्ति को जीते-जी अपने चार बच्चों में बांट दिया। उन्होंने बच्चों के लिए घर बनवाए ताकि उनके जाने के बाद किसी को परेशानी न हो। परिवार में कई शादियों की जिम्मेदारी भी उन्होंने खुद उठाई। इंद्रय्या का मानना था कि इंसान जो कुछ जमा करता है, वह यहीं रह जाता है, लेकिन जो दूसरों को देता है, वही उसकी असली कमाई होती है। यही वजह थी कि उन्होंने अपने जीवन को संग्रह नहीं, बल्कि सेवा और बांटने का माध्यम बनाया। गांव के लोग आज भी उन्हें एक दयालु, सरल और दूरदर्शी इंसान के रूप में याद कर रहे हैं।
अंतिम इच्छा पूरी, उसी कब्र में दफनाया गया
11 जनवरी को इंद्रय्या ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके निधन के बाद परिवार और गांव वालों ने उनकी अंतिम इच्छा को पूरी तरह सम्मान दिया। उन्हें उसी कब्र में दफनाया गया, जिसे उन्होंने सालों पहले अपने लिए खुद तैयार किया था। अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए और हर किसी की आंखों में नमी के साथ सम्मान भी साफ नजर आ रहा था। लोगों का कहना था कि इंद्रय्या ने मरते दम तक किसी पर बोझ न बनने की सोच को निभाया। उन्होंने पहले ही कह दिया था कि उनकी मौत के बाद किसी को परेशान नहीं होना चाहिए। उनका यह कदम आज भी लोगों के लिए एक बड़ा संदेश छोड़ गया है कि मौत से डरने के बजाय, अगर उसे समझ लिया जाए, तो जीवन ज्यादा सरल और सार्थक हो सकता है। इंद्रय्या भले ही अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी सोच और जीवन का तरीका लंबे समय तक लोगों को सोचने पर मजबूर करता रहेगा।
