मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में किसानों की नाराजगी अब खुलकर सामने आने लगी है। वजह है—फसल की समय पर तुलाई और खरीद प्रक्रिया में लगातार हो रही देरी। गेहूं खरीद केंद्रों पर स्लॉट बुकिंग की समस्या और धीमी प्रक्रिया के कारण किसान लंबे समय से परेशान हैं। यह मुद्दा अब सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सत्तारूढ़ BJP के स्थानीय नेताओं और विधायकों तक पहुंच गया है। विदिशा, जो केंद्रीय कृषि मंत्री Shivraj Singh Chouhan का गृह जिला है, वहां हालात ऐसे बन गए हैं कि पार्टी के भीतर से ही सरकार पर सवाल उठने लगे हैं।
विधायक और नेता खुलकर विरोध में उतरे
शमशाबाद विधानसभा क्षेत्र में किसानों की समस्याएं उस समय और बढ़ गईं जब गेहूं की खरीदी में देरी को लेकर स्थानीय विधायक सूर्यप्रकाश मीणा ने खुलकर नाराजगी जताई। उन्होंने साफ कहा कि अगर 10 दिनों के भीतर किसानों की फसल की खरीद शुरू नहीं होती, तो वे सड़क पर उतरकर आंदोलन करेंगे। उनका यह बयान राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है, क्योंकि आमतौर पर सत्तापक्ष के विधायक अपनी ही सरकार के खिलाफ इतने सीधे तेवर नहीं दिखाते। किसानों की बढ़ती परेशानी ने जनप्रतिनिधियों को भी मजबूर कर दिया है कि वे सार्वजनिक रूप से प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाएं।
पूर्व विधायक का कलेक्ट्रेट घेराव
इसी बीच पूर्व विधायक शशांक भार्गव भी किसानों के समर्थन में सड़क पर उतर आए। उन्होंने बड़ी संख्या में किसानों के साथ कलेक्ट्रेट का घेराव किया और प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर तत्काल खरीद प्रक्रिया शुरू करने की मांग की। इस दौरान उन्होंने मीडिया से बातचीत में अपनी ही सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि खरीदी में देरी केवल तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि इसके पीछे प्रशासनिक उदासीनता और नीयत से जुड़ी समस्या भी हो सकती है। उनके इस बयान ने मामले को और अधिक राजनीतिक रंग दे दिया है और विरोध की धार को तेज कर दिया है।
बढ़ता दबाव और राजनीतिक चुनौती
विदिशा जैसे कृषि प्रधान जिले में किसानों की नाराजगी सरकार के लिए बड़ा संकेत मानी जा रही है। यहां की अर्थव्यवस्था सीधे तौर पर कृषि पर निर्भर है, ऐसे में फसल खरीद में देरी से न केवल किसानों की आय प्रभावित हो रही है, बल्कि राजनीतिक दबाव भी बढ़ रहा है। स्थानीय स्तर पर भाजपा नेताओं का आंदोलन में शामिल होना इस बात का संकेत है कि मामला अब सिर्फ प्रशासनिक नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक चुनौती में बदल चुका है। अगर जल्द समाधान नहीं निकला, तो यह असंतोष बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है, जिसका असर आने वाले समय में राज्य की राजनीति पर भी पड़ सकता है।
