पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की राजनीति अचानक गरमा गई है। राज्यपाल सीवी आनंद बोस के इस्तीफे के बाद कई राजनीतिक दलों ने इस फैसले पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने चुनावी माहौल में नई बहस को जन्म दे दिया है।
समाजवादी पार्टी (सपा) ने इस मामले को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर निशाना साधा है। सपा प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने कहा कि जिस तरीके से राज्यपाल को हटाया गया या उनके इस्तीफे की स्थिति बनी, वह कई सवाल खड़े करता है। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे फैसले सोच-समझकर और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होने चाहिए।
सपा ने उठाए गंभीर सवाल
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने मीडिया से बातचीत में कहा कि जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी ने बिना चुनी हुई राज्य सरकार से सलाह किए या मुख्यमंत्री से राय लिए बिना राज्यपाल को हटाने जैसा माहौल बनाया, वह चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि इस मामले में पारदर्शिता की कमी दिखाई देती है।
फखरुल हसन चांद ने कहा कि यह वही मुद्दा है जिसे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी कई बार उठा चुकी हैं। उनका कहना है कि जिन राज्यों में गैर-बीजेपी सरकारें हैं, वहां केंद्र सरकार राज्यपाल के माध्यम से राजनीतिक हस्तक्षेप करने की कोशिश करती है। सपा के अनुसार, यह लोकतांत्रिक ढांचे के लिए ठीक संकेत नहीं है और इससे संघीय व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।
.ममता बनर्जी ने भी जताई है हैरानी
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी राज्यपाल के इस्तीफे को लेकर आश्चर्य जताया है। उनका कहना है कि चुनाव से ठीक पहले ऐसा कदम उठाया जाना कई सवाल खड़े करता है। राज्य में पहले से ही चुनावी माहौल गरम है और ऐसे समय में संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का अचानक इस्तीफा देना राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक आने के कारण हर राजनीतिक घटना का असर चुनावी रणनीति पर पड़ सकता है। राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच पहले भी कई मुद्दों पर मतभेद देखने को मिले थे, इसलिए यह इस्तीफा और भी ज्यादा चर्चा में आ गया है।
आर एन रवि को मिला अतिरिक्त प्रभार
राज्यपाल सीवी आनंद बोस के इस्तीफे के बाद फिलहाल प्रशासनिक व्यवस्था को जारी रखने के लिए नया फैसला लिया गया है। तमिलनाडु के राज्यपाल आर एन रवि को पश्चिम बंगाल के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। यानी फिलहाल वे दोनों राज्यों की जिम्मेदारी संभालेंगे जब तक कि पश्चिम बंगाल के लिए स्थायी राज्यपाल की नियुक्ति नहीं हो जाती।
इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। विपक्षी दल इस मामले को लेकर केंद्र सरकार की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि बीजेपी की ओर से अभी इस पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा बंगाल की राजनीति में और गर्मा सकता है, खासकर तब जब विधानसभा चुनाव करीब हैं।
