बिहार की राजनीति में एक बार फिर बयानबाजी का तापमान अचानक बढ़ गया है। पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव ने कथावाचक पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को लेकर ऐसा बयान दे दिया, जिसने सियासी और सामाजिक दोनों स्तरों पर बहस छेड़ दी है। पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में पप्पू यादव ने धीरेंद्र शास्त्री को “चोर-उचक्का” बताते हुए कहा कि ऐसे लोगों से समाज का कोई लेना-देना नहीं है। उनका कहना था कि धर्म और अध्यात्म का नाम लेकर कुछ लोग केवल भीड़ जुटाने और समाज को बांटने का काम कर रहे हैं। पप्पू यादव ने इसी दौरान संत प्रेमानंद महाराज की खुले तौर पर तारीफ भी की और उन्हें सच्चा संत बताया। सांसद के इस बयान का वीडियो और बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया, जिसके बाद समर्थक और विरोधी दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए।
पटना कथा विवाद की फिर याद दिलाई
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का नाम बिहार में नया नहीं है। जब वे पहली बार पटना में कथा करने पहुंचे थे, तब भी इसका तीखा विरोध देखने को मिला था। उस समय विपक्षी दलों ने भारतीय जनता पार्टी पर धार्मिक ध्रुवीकरण का आरोप लगाया था और कई नेताओं ने इसे राजनीतिक एजेंडा बताया था। बावजूद इसके कथा का आयोजन हुआ और भारी संख्या में लोग उसमें शामिल हुए। उस पूरे घटनाक्रम ने बिहार की राजनीति में धर्म और राजनीति के रिश्ते पर लंबी बहस को जन्म दिया था। अब पप्पू यादव के ताजा बयान ने उस पुराने विवाद को फिर से हवा दे दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी माहौल से पहले ऐसे बयान समाज में पहले से मौजूद मतभेदों को और गहरा कर सकते हैं। वहीं, धीरेंद्र शास्त्री के समर्थक इसे संत के अपमान के रूप में देख रहे हैं और पप्पू यादव की भाषा पर सवाल उठा रहे हैं।
धार्मिक संगठनों की प्रतिक्रिया
इस पूरे विवाद पर ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। उन्होंने कहा कि इस तरह की बातें बहुसंख्यक समुदाय को भड़काने और उकसाने वाली हैं। मौलाना ने बयान देते हुए कहा कि देश को जोड़ने की जरूरत है, न कि ऐसे शब्दों से लोगों के बीच नफरत फैलाने की। उन्होंने एक प्रतीकात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि “जिस दिन तिरंगे में चांद लग गया, उस दिन देश की खूबसूरती में चार चांद लग जाएंगे,” यानी सभी समुदायों के सम्मान और आपसी सौहार्द से ही देश मजबूत होगा। मौलाना के इस बयान के बाद यह साफ हो गया कि मामला अब सिर्फ एक नेता और एक कथावाचक तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे सामाजिक और सांप्रदायिक नजरिए से भी देखा जाने लगा है।
सियासी असर और आगे की राह
पप्पू यादव का यह विवादित बयान ऐसे समय पर आया है, जब बिहार की राजनीति पहले ही कई मुद्दों को लेकर गरमाई हुई है। जानकारों का कहना है कि इस तरह की टिप्पणियां भले ही सुर्खियां बटोर लें, लेकिन इससे समाज में तनाव बढ़ने का खतरा रहता है। एक तरफ पप्पू यादव अपने बयान पर कायम नजर आ रहे हैं, तो दूसरी तरफ धीरेंद्र शास्त्री के समर्थक माफी की मांग कर रहे हैं। राजनीतिक दल भी इस मुद्दे पर अपने-अपने हिसाब से प्रतिक्रिया दे रहे हैं। कुछ इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बता रहे हैं, तो कुछ इसे जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति की असंयमित भाषा मान रहे हैं। कुल मिलाकर, यह विवाद एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि सार्वजनिक जीवन में धर्म, राजनीति और भाषा की मर्यादा की रेखा आखिर कहां खींची जानी चाहिए।
