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चीनी मिल में सस्ती, फिर दुकानों पर महंगी क्यों? 47 रुपये वाली चीनी के लिए ग्राहक दे रहे 60+ रुपये

चीनी की एक्स-मिल कीमत करीब 47 रुपये किलो तक गिरने के बावजूद दुकानों पर रेट 60 रुपये से ज्यादा क्यों है? जानें चीनी की कीमतों का पूरा गणित और कब मिलेगी राहत।

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चीनी की कीमतों में मिल स्तर पर बड़ी गिरावट आने के बावजूद आम ग्राहकों को इसका फायदा पूरी तरह नहीं मिल रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीनी की एक्स-मिल कीमत करीब 67 रुपये प्रति किलो से घटकर लगभग 47 रुपये प्रति किलो तक आ गई है। इसके बावजूद कई जगह खुदरा बाजार में चीनी 60 रुपये या उससे ज्यादा कीमत पर बिक रही है। यही वजह है कि लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि जब मिल से चीनी इतनी सस्ती मिल रही है तो दुकानों पर इसका भाव कम क्यों नहीं हुआ। दरअसल, मिल से निकलने के बाद चीनी सीधे ग्राहक तक नहीं पहुंचती। इसके बीच थोक कारोबारी, ट्रांसपोर्टर और रिटेलर की लागत और मार्जिन जुड़ता है। लेकिन चीनी उद्योग का कहना है कि इस समय मिल और खुदरा कीमत के बीच का अंतर सामान्य से काफी ज्यादा है।

क्या होती है एक्स-मिल कीमत? समझिए पूरा गणित

एक्स-मिल कीमत वह रेट होता है जिस पर चीनी मिल से बाहर निकलते समय चीनी बेची जाती है। इसके बाद माल को गोदाम या बाजार तक पहुंचाने में परिवहन खर्च जुड़ता है। फिर थोक व्यापारी और दुकानदार अपना मार्जिन जोड़ते हैं और इसी के बाद अंतिम कीमत तय होती है। इसलिए एक्स-मिल कीमत कम होते ही उसी दिन दुकानों पर कीमत उतनी ही कम हो जाए, यह जरूरी नहीं है। कारोबारियों के पास पहले से खरीदा गया पुराना स्टॉक भी हो सकता है, जिसे उन्होंने ऊंचे दाम पर खरीदा था। ऐसे में वे पुराने स्टॉक को लागत के हिसाब से बेचते हैं। हालांकि, अगर नए स्टॉक की खरीद काफी सस्ती हो चुकी है और सप्लाई भी पर्याप्त है, तो धीरे-धीरे खुदरा कीमतों में भी गिरावट आनी चाहिए।

चीनी की कमी नहीं, फिर 60-65 रुपये क्यों?

चीनी उद्योग की ओर से खुद इस अंतर को लेकर सवाल उठाए गए हैं। उद्योग का कहना है कि बाजार में चीनी की उपलब्धता को लेकर कोई बड़ी कमी नहीं है और सप्लाई बनी हुई है। ऐसे में अगर मिल से चीनी करीब 47 रुपये प्रति किलो के आसपास निकल रही है और ग्राहक को इसके लिए 60-65 रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं, तो कीमतों के बीच का अंतर जांच का विषय बन जाता है। हालांकि, खुदरा बाजार में रेट कई स्थानीय कारणों से अलग-अलग हो सकता है। इसमें परिवहन खर्च, थोक व्यापारियों का मार्जिन, दुकानदार की लागत और पुराने स्टॉक की कीमत शामिल है। इसलिए मिल की कीमत और ग्राहक द्वारा चुकाई जाने वाली कीमत के बीच कुछ अंतर स्वाभाविक है, लेकिन उद्योग का तर्क है कि मौजूदा अंतर जरूरत से ज्यादा है।

सरकार के कदमों का असर कब दिखेगा?

चीनी की कीमतों पर दबाव कम करने के लिए सरकार ने भी कई कदम उठाए हैं। इनमें 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात की अनुमति और बाजार में जमाखोरी पर निगरानी जैसे उपाय शामिल हैं। इसके अलावा थोक खरीदारों के लिए स्टॉक रखने की सीमा भी तय की गई है, ताकि बाजार में कृत्रिम कमी पैदा न हो। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आम आदमी को सस्ती चीनी कब मिलेगी। उम्मीद है कि जैसे-जैसे पुराने महंगे स्टॉक की जगह सस्ता नया स्टॉक बाजार में आएगा, खुदरा कीमतों में भी कमी दिखाई दे सकती है। हालांकि, दुकानों पर चीनी कितनी सस्ती होगी, यह सप्लाई, कारोबारियों की खरीद कीमत और स्थानीय बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगा।

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