सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान ऐसा घटनाक्रम सामने आया जिसने अदालत में मौजूद सभी लोगों को हैरान कर दिया। याचिकाकर्ता के रूप में खुद अपना पक्ष रख रहे वकील प्रबल प्रताप ने पहले न्यायाधीशों को असामान्य तरीके से संबोधित किया और फिर अदालत के सामने ऐसी बातें कहीं, जिनसे माहौल तनावपूर्ण हो गया। बताया जाता है कि उन्होंने न्यायाधीशों को निर्देश देने जैसी भाषा का इस्तेमाल किया और अपनी मांगों को अदालत के सामने बेहद आक्रामक अंदाज में रखा। उनकी बातों और व्यवहार को देखकर कोर्टरूम में मौजूद वकील और अन्य लोग भी हैरान रह गए। कुछ ही मिनटों में सामान्य सुनवाई का माहौल विवाद और हंगामे में बदल गया।
कागज उछाले, सुरक्षा कर्मियों को करना पड़ा हस्तक्षेप
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब प्रबल प्रताप ने कथित तौर पर मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। इसके बाद उन्होंने अपने पास मौजूद दस्तावेज हवा में उछाल दिए, जिससे अदालत की कार्यवाही प्रभावित हुई। कोर्टरूम में मौजूद सुरक्षाकर्मियों को तत्काल हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्हें अदालत कक्ष से बाहर ले जाया गया। कुछ समय तक उन्हें अदालत परिसर के एक कार्यालय में भी रोका गया। इस घटना के बाद यह चर्चा तेज हो गई कि क्या उनके खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला चलेगा या फिर पुलिस कार्रवाई होगी। आमतौर पर अदालत की गरिमा से जुड़े मामलों में सख्त रुख देखने को मिलता है, इसलिए सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम पर टिकी थीं।
अदालत ने दिखाई सख्ती नहीं, जताई सहानुभूति
घटना के बाद सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब सुप्रीम कोर्ट ने प्रबल प्रताप के खिलाफ किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई शुरू करने से इनकार कर दिया। सुनवाई कर रही पीठ ने कहा कि वह उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का प्रस्ताव नहीं रखती। अदालत का मानना था कि याचिकाकर्ता काफी परेशान और हताश नजर आ रहा था तथा उसका व्यवहार उसी मानसिक स्थिति का परिणाम हो सकता है। न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि अदालत को उसके प्रति केवल सहानुभूति है। यही कारण रहा कि पूरे घटनाक्रम के बावजूद न तो अवमानना की कार्रवाई शुरू की गई और न ही किसी अन्य दंडात्मक कदम की घोषणा की गई। कोर्ट के इस रुख ने कानूनी हलकों में भी चर्चा पैदा कर दी, क्योंकि ऐसे मामलों में अक्सर कड़ा रुख देखने को मिलता है।
आखिर क्या था पूरा मामला, क्यों पहुंचा था सुप्रीम कोर्ट?
प्रबल प्रताप की याचिका एक पुराने कानूनी विवाद से जुड़ी हुई थी। उन्होंने लखनऊ से जुड़े एक मामले में पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की थी। हालांकि संबंधित मजिस्ट्रेट ने सीधे एफआईआर का आदेश देने के बजाय मामले को निजी शिकायत के रूप में आगे बढ़ाने का फैसला किया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए प्रबल प्रताप पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचे, लेकिन हाई कोर्ट ने यह कहते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी कि उनके पास अन्य कानूनी विकल्प उपलब्ध हैं। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। शीर्ष अदालत ने रिकॉर्ड और दस्तावेजों की समीक्षा करने के बाद पाया कि हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई पर्याप्त आधार नहीं है। इसी के साथ उनकी विशेष अनुमति याचिका (SLP) भी खारिज कर दी गई। हालांकि इस सुनवाई की सबसे ज्यादा चर्चा अदालत के फैसले से ज्यादा उस हंगामे और फिर अदालत द्वारा दिखाई गई संयमित प्रतिक्रिया को लेकर हो रही है।
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