मोदी सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री के रूप में कार्यरत जॉर्ज कुरियन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है, जिसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंजूरी भी दे दी है। इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं कि क्या यह सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया है या फिर सरकार में किसी बड़े बदलाव का संकेत। कुरियन मत्स्य पालन और अल्पसंख्यक मामलों के राज्य मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे थे, और उनके इस्तीफे ने अचानक सियासी समीकरणों को चर्चा में ला दिया है।
राज्यसभा कार्यकाल खत्म होने के बाद स्थिति क्या बनी?
जॉर्ज कुरियन को अगस्त 2024 में मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुना गया था और उनका कार्यकाल 4 सितंबर 2024 से शुरू हुआ था। यह सीट ज्योतिरादित्य सिंधिया के लोकसभा में चुने जाने के बाद खाली हुई थी। हालांकि हाल ही में उनका राज्यसभा कार्यकाल समाप्त हो गया और उन्हें दोबारा रिपीट नहीं किया गया। इसके बाद वे संसद के किसी भी सदन के सदस्य नहीं रहे, जिससे संवैधानिक रूप से मंत्री पद पर बने रहना संभव नहीं था। इसी कारण उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दिया।
राष्ट्रपति की मंजूरी और आधिकारिक प्रक्रिया
राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में स्पष्ट किया गया है कि प्रधानमंत्री की सलाह पर भारत के राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 75 के तहत जॉर्ज कुरियन का इस्तीफा तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर लिया है। इस प्रक्रिया के बाद अब वह आधिकारिक रूप से केंद्रीय मंत्रिपरिषद का हिस्सा नहीं रह गए हैं। यह कदम संवैधानिक नियमों के अनुरूप माना जा रहा है, जिसमें मंत्री को संसद के किसी भी सदन का सदस्य होना आवश्यक होता है।
राजनीतिक संदेश और जॉर्ज कुरियन का सफर
जॉर्ज कुरियन लंबे समय से बीजेपी से जुड़े हुए वरिष्ठ नेता रहे हैं और 1980 में पार्टी के गठन के समय से ही संगठन में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में उपाध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया है और वाजपेयी सरकार के दौरान महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली थीं। केरल में ईसाई समुदाय के बीच उनकी पकड़ को देखते हुए उन्हें केंद्र सरकार में शामिल करना एक बड़ा राजनीतिक संदेश माना गया था। अब उनके इस्तीफे के बाद यह चर्चा भी तेज है कि आने वाले समय में सरकार के भीतर और क्या बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
