जयपुर में (JDA) का एक ऐसा कदम सामने आया है, जिसने न सिर्फ शहर बल्कि पूरे प्रदेश में चर्चा का तूफान ला दिया है। आमतौर पर अतिक्रमण नोटिस किसी व्यक्ति, संस्था या संबंधित प्रबंधक को भेजा जाता है, लेकिन इस बार JDA ने नोटिस सीधे “भगवान शिव” के नाम जारी कर दिया। यह घटनाक्रम जैसे ही सामने आया, सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय राजनीति तक हर जगह एक ही सवाल उठने लगा—क्या प्रशासन अब भगवान को भी कानूनी कार्रवाई के दायरे में शामिल करने लगा है? नोटिस की भाषा, इसकी प्रक्रिया और समय—सभी ने इस मामले को रहस्यमयी और बेहद अजीबोगरीब बना दिया है।
नोटिस में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि “अतिक्रमण हटाया न गया तो एक साल तक की कैद और एक लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जाएगा।” यही वाक्य सबसे ज्यादा वायरल हो रहा है, क्योंकि सवाल उठ रहा है—अगर कार्रवाई की नौबत आएगी तो सजा किसे दी जाएगी? पुजारी को, ट्रस्टी को या फिर वह ‘पूज्य नाम’ जिसे नोटिस में लिखा गया है?
नोटिस में आरोपी कौन—भगवान, पुजारी या प्रबंधन?
सबसे बड़ा रहस्य यही है कि नोटिस में मंदिर प्रबंधन, पुजारी, ट्रस्ट या किसी जिम्मेदार व्यक्ति का नाम दर्ज नहीं है। नोटिस पर सीधे लिखा है—“श्री भगवान शिव, (मंदिर परिसर), आप अतिक्रमण हटा लें।” यह पहली बार नहीं है कि किसी धार्मिक स्थल को अतिक्रमण मानकर कार्रवाई की बात उठी हो, लेकिन इस तरह ‘भगवान’ को नोटिस भेजा जाना बेहद असामान्य है। कानूनी रूप से भी यह एक उलझा हुआ मामला बन गया है, क्योंकि कानून स्पष्ट कहता है कि नोटिस उस व्यक्ति या संस्था को दिया जाता है जो जमीन का कब्जेदार हो या उसके संचालन से जुड़ा हो। मंदिर समिति से जुड़े लोगों का कहना है कि वे पहले ही इस जमीन की स्थिति और दस्तावेज JDA को सौंप चुके हैं। उनका दावा है कि मंदिर वर्षों से मौजूद है और स्थानीय लोगों की धार्मिक आस्था का केंद्र है। कई भक्तों ने कहा कि प्रशासन चाहे तो बात उनसे करे, पर भगवान के नाम नोटिस भेजना ‘आस्था का अपमान’ है।
वहीं JDA अधिकारियों का दावा है कि नोटिस प्रक्रिया के तहत स्वचालित रूप से तैयार होता है और कई बार फील्ड में मौजूद अधिकारी जिस तरह दस्तावेज डालते हैं, उसी आधार पर नाम दर्ज हो जाता है। हालांकि यह सफाई लोगों को संतोषजनक नहीं लग रही है। खासतौर पर सोशल मीडिया पर लोग मज़ाकिया अंदाज में पूछ रहे “अगर भगवान कोर्ट पहुंच गए तो वकील कौन बनेगा?”
अतिक्रमण की कार्रवाई या धार्मिक विवाद का नया अध्याय?
इस विवाद के आगामी प्रभावों और प्रशासनिक चुनौतियों पर केंद्रित है। जयपुर में कई स्थानों पर JDA जमीनों पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई कर रहा है, पर धार्मिक स्थल हमेशा संवेदनशील श्रेणी में आते हैं। मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारा से जुड़े मामलों में प्रशासन को बेहद सावधानी बरतनी पड़ती है। इस केस में नोटिस की ‘ग़लत अड्रेसिंग’ ने स्थिति को और उलझा दिया है। मंदिर के आस-पास रहने वाले लोगों ने भी इसे ‘प्रशासन की जल्दबाजी’ बताया है। उनका कहना है कि अगर JDA को कोई कार्रवाई करनी थी, तो पहले मंदिर समिति से बात की जा सकती थी।
कुछ स्थानीय नेता अब इस मामले को राजनीतिक मैदान में खींचने की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि धार्मिक संरचनाओं से जुड़े मुद्दों पर प्रशासन को पारदर्शिता रखनी चाहिए और जनता की आस्था के साथ खिलवाड़ की छवि नहीं बननी चाहिए।
वहीं प्रशासन के भीतर एक धड़ा यह भी मानता है कि यह मामला JDA की लापरवाही का नतीजा है और आने वाले दिनों में उच्च-स्तरीय जांच की जरूरत पड़ सकती है। अगर नोटिस वापस लिया जाता है या संशोधित किया जाता है, तब भी मामला खत्म नहीं होगा, क्योंकि लोगों के बीच प्रशासन की छवि पर इसका असर पड़ चुका है।
READ MORE-माफिया अतीक के बेटे के वीडियो ने मचाया बवाल, बोले ‘हम कुत्तों की तरह पीछे से वार नहीं…
