भारतीय कला जगत से बुधवार को एक बेहद दुखद खबर सामने आई। विश्व प्रसिद्ध मूर्तिकार राम सुतार का 100 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने गुरुग्राम स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। लंबे समय से उम्र से जुड़ी बीमारियों से जूझ रहे राम सुतार ने शांतिपूर्वक इस दुनिया को अलविदा कहा। उनके निधन की पुष्टि उनके बेटे अनिल सुतार ने की, जिन्होंने बताया कि बुधवार देर रात उनका देहांत हुआ। उनके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया गुरुवार सुबह 11 बजे संपन्न की जाएगी। राम सुतार के निधन की खबर फैलते ही देश-विदेश में कला प्रेमियों, कलाकारों और आम लोगों के बीच शोक की लहर दौड़ गई। जिस कलाकार ने पत्थर, धातु और कांसे में जान फूंक दी, उसके जाने से कला जगत में एक ऐसा खालीपन आ गया है, जिसकी भरपाई करना मुश्किल माना जा रहा है।
महाराष्ट्र से शुरू हुआ सफर, विश्व स्तर तक बनाई पहचान
राम सुतार का जन्म वर्ष 1925 में महाराष्ट्र के गोंदूर गांव में हुआ था, जो वर्तमान में धुले जिले का हिस्सा है। बेहद साधारण परिवार में जन्मे राम सुतार को बचपन से ही कला से गहरा लगाव था। कहा जाता है कि वह मिट्टी और पत्थरों से बचपन में ही आकृतियां बनाना शुरू कर देते थे। उनकी प्रतिभा को सही दिशा तब मिली जब उन्होंने मुंबई के प्रतिष्ठित जेजे स्कूल ऑफ आर्ट एंड आर्किटेक्चर में दाखिला लिया। यहां उन्होंने न केवल मूर्तिकला की बारीकियां सीखीं, बल्कि अपनी मेहनत और लगन से गोल्ड मेडल भी हासिल किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद राम सुतार ने भारतीय मूर्तिकला को आधुनिक पहचान दिलाने का बीड़ा उठाया। धीरे-धीरे उनकी कला की चर्चा देश की सीमाओं से बाहर पहुंची और वह भारत के सबसे सम्मानित मूर्तिकारों में गिने जाने लगे।
पत्थर में प्राण फूंकने वाला कलाकार थे राम सुतार
राम सुतार की कला की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उनकी बनाई मूर्तियां सिर्फ संरचनाएं नहीं, बल्कि भावनाओं से भरी प्रतीत होती थीं। संसद परिसर में ध्यानमग्न मुद्रा में स्थापित महात्मा गांधी की प्रतिमा हो या घोड़े पर सवार छत्रपति शिवाजी महाराज की भव्य मूर्ति, हर रचना में जीवंतता दिखाई देती है। उन्होंने देश के कई प्रमुख स्थानों पर महान व्यक्तित्वों की प्रतिमाएं बनाईं, जो आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं। कहा जाता था कि राम सुतार जिस पत्थर को छू लेते थे, वह एक अद्भुत कलाकृति में बदल जाता था। उनकी बनाई मूर्तियां न सिर्फ देखने में सुंदर थीं, बल्कि उनमें भारतीय संस्कृति, इतिहास और आत्मा की झलक साफ नजर आती थी। यही वजह है कि उनकी कलाएं आने वाली पीढ़ियों तक याद की जाती रहेंगी।
पद्म भूषण से किया गया था सम्मानित
राम सुतार को विश्व स्तर पर सबसे बड़ी पहचान सरदार वल्लभभाई पटेल की ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ से मिली, जो दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है। इस प्रतिमा के निर्माण के साथ ही राम सुतार का नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया। यह सिर्फ एक मूर्ति नहीं, बल्कि भारतीय एकता, संकल्प और आत्मविश्वास का प्रतीक बनी। उनकी अद्वितीय कला के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1999 में पद्म श्री और 2016 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। इसके अलावा हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें राज्य के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘महाराष्ट्र भूषण’ से भी नवाजा था। राम सुतार का जाना भले ही एक युग का अंत हो, लेकिन उनकी बनाई प्रतिमाएं उन्हें हमेशा जीवित रखेंगी और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेंगी।
