बिहार का बहुचर्चित भरत तिवारी एनकाउंटर मामला अब सिर्फ एक पुलिसिया कार्रवाई नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बहुत बड़ा कानूनी और सियासी संग्राम बन चुका है। इस एनकाउंटर की गूंज अब पटना हाई कोर्ट तक पहुंच गई है, जिससे राज्य प्रशासन में खलबली मच गई है। भरत तिवारी के परिवार ने पुलिस के दावों को झूठा बताते हुए देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई (CBI) से निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की वकील वर्षा कुमारी ने भरत तिवारी की मां आशा देवी की तरफ से यह रिट याचिका सीधे पटना हाई कोर्ट में दायर की है। इससे पहले जो जनहित याचिकाएं कोर्ट में थीं, उनमें परिवार शामिल नहीं था, लेकिन अब खुद पीड़ित मां इंसाफ मांगने कोर्ट पहुंच गई है। इसके बाद से ही पुलिस महकमे में बेचैनी साफ दिख रही है, क्योंकि याचिका में सीधे तौर पर एनकाउंटर की कहानी को चुनौती दी गई है। अब हर किसी की नजरें 3 जुलाई को होने वाली संभावित सुनवाई पर टिकी हैं।
न्यायिक जांच समिति पर अविश्वास, निष्पक्ष सीबीआई जांच ही आखिरी उम्मीद
एक तरफ जहां चौतरफा दबाव के बाद बिहार सरकार ने डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की और हाई कोर्ट के एक रिटायर्ड जज की देखरेख में न्यायिक जांच का आदेश दे दिया, वहीं दूसरी तरफ पीड़ित परिवार ने इस सरकारी समिति पर भरोसा करने से साफ इनकार कर दिया है। वकील वर्षा कुमारी का कहना है कि परिवार को ऐसी कमेटियों पर बिल्कुल भरोसा नहीं है, क्योंकि ऐसी जांचें अक्सर समय के साथ ठंडी पड़ जाती हैं और सच सामने नहीं आ पाता। परिवार चाहता है कि सीबीआई जैसी स्वतंत्र एजेंसी इस केस को अपने हाथ में ले ताकि बिना किसी स्थानीय पुलिस या राजनीतिक दबाव के दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। वकील ने साफ कहा कि यह लड़ाई सिर्फ एक परिवार की नहीं है, बल्कि पूरे समाज की है। अगर भरत तिवारी को न्याय नहीं मिला, तो भविष्य में कोई भी आम नौजवान सिस्टम की गलतियों के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं कर पाएगा।
खाकी की ‘प्रतिशोध वाली एफआईआर’ और पीड़ित परिवार का आत्मदाह का अल्टीमेटम
इस मामले में पुलिस की भूमिका पर भी बेहद तीखे सवाल उठाए जा रहे हैं। वकील वर्षा कुमारी ने आरोप लगाया कि पुलिस ने अपनी गलती छिपाने और परिवार को डराने के लिए भरत तिवारी, उनके पिता और भाई पर ‘रिटैलिएटरी एफआईआर’ यानी प्रतिशोध की भावना से झूठे मुकदमे दर्ज किए हैं। पुलिस की रणनीति है कि परिवार कानूनी पचड़ों में उलझ जाए और न्याय की मांग से पीछे हट जाए। लेकिन इस सब के बीच परिवार की मानसिक स्थिति बहुत खराब हो चुकी है। भरत की मां, बहन और भाई गहरे सदमे में हैं। मां ने तो यहां तक चेतावनी दी है कि अगर उन्हें अदालत से न्याय नहीं मिला, तो वे आत्मदाह जैसा आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर हो जाएंगे। परिवार की यह बात दिखाती है कि वे सिस्टम से कितने परेशान हो चुके हैं। हालांकि, उनकी वकील ने उन्हें अदालत पर भरोसा रखने को कहा है और यह भी साफ किया है कि वे यह केस बिल्कुल मुफ्त (निःशुल्क) लड़ रही हैं और जरूरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगी।
सरकार का पक्ष और अवैध हथियारों का रहस्यमयी एंगल
इस पूरे विवाद के बीच बिहार सरकार भी बैकफुट पर दिख रही है। सरकार के मंत्री दिलीप जायसवाल ने कहा कि सरकार ने संवेदनशीलता दिखाते हुए तुरंत न्यायिक जांच का फैसला किया था और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। सरकार का कहना है कि इस जांच में न सिर्फ पुलिस की भूमिका को देखा जाएगा, बल्कि इस बात का भी पता लगाया जाएगा कि भरत तिवारी के पास वह कथित अवैध हथियार कहाँ से आया, जिसका दावा पुलिस कर रही है। सरकार भले ही इसे अपनी निष्पक्षता बता रही हो, लेकिन विपक्ष और आम जनता इसे सिर्फ गुस्सा शांत करने का जरिया मान रही है। कुल मिलाकर, यह मामला अब ऐसे मोड़ पर है जहां से बिहार की कानून व्यवस्था की साख तय होगी। 3 जुलाई की सुनवाई ही यह साफ करेगी कि मामला सीबीआई के पास जाएगा या सरकारी कमेटी ही इसकी जांच करेगी।
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