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शिवाजी वाले बयान पर मचा बवाल! अब आई सफाई, क्या सच में गलत समझा गया धीरेंद्र शास्त्री का बयान?

धीरेंद्र शास्त्री ने शिवाजी महाराज पर दिए बयान को लेकर माफी मांगी। जानिए पूरा मामला, विवाद की वजह और उनकी सफाई ।

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बागेश्वर धाम के प्रमुख धीरेंद्र शास्त्री ने छत्रपति शिवाजी महाराज पर दिए अपने बयान को लेकर हुए विवाद के बाद माफी मांग ली है। नागपुर में मीडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी बातों को गलत तरीके से दिखाया गया, जबकि उनका इरादा केवल शिवाजी महाराज का सम्मान बढ़ाना था। उन्होंने कहा कि जब भी वे नागपुर आते हैं, किसी न किसी वजह से विवाद खड़ा हो जाता है। शास्त्री ने यह भी कहा कि अगर उनके शब्दों से किसी की भावनाएं आहत हुई हैं, तो वह उसके लिए क्षमा चाहते हैं। उनका दावा है कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा जिससे किसी महान व्यक्तित्व का अपमान हो।

बयान पर क्या था विवाद

यह विवाद तब शुरू हुआ जब धीरेंद्र शास्त्री ने एक कार्यक्रम में कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज युद्ध करते-करते थक गए थे और वे अपना मुकुट समर्थ रामदास स्वामी को सौंपना चाहते थे। इस बयान को लेकर कई लोगों ने नाराजगी जताई और इसे इतिहास के खिलाफ बताया। कार्यक्रम में देवेंद्र फडणवीस और मोहन भागवत भी मौजूद थे। शास्त्री का कहना है कि उनका उद्देश्य शिवाजी महाराज की भक्ति और संतों के प्रति सम्मान को दिखाना था, लेकिन उनकी बात का गलत मतलब निकाल लिया गया। उन्होंने कहा कि अगर कोई पूरा बयान सुनेगा, तो उसे समझ आएगा कि उन्होंने सम्मान की भावना से ही बात कही थी।

साजिश का आरोप

धीरेंद्र शास्त्री ने इस पूरे मामले को साजिश से भी जोड़ा है। उनका कहना है कि कुछ लोग जानबूझकर उनके बयानों को गलत तरीके से पेश करते हैं ताकि उनकी छवि खराब की जा सके। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके धर्मांतरण के खिलाफ चल रहे अभियान को रोकने के लिए ऐसा किया जा रहा है। शास्त्री ने कहा कि कुछ ताकतें लगातार सनातन धर्म और संतों के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वे ऐसे किसी भी दबाव में आने वाले नहीं हैं और अपने काम को जारी रखेंगे।

श्रद्धा और अंधविश्वास पर राय

अंधविश्वास को बढ़ावा देने के आरोपों पर धीरेंद्र शास्त्री ने साफ किया कि उनका दरबार लोगों को सही रास्ता दिखाने के लिए है, न कि अंधविश्वास फैलाने के लिए। उन्होंने कहा कि श्रद्धा और अंधविश्वास में फर्क समझना जरूरी है—जब हम समझकर विश्वास करते हैं तो वह श्रद्धा होती है, लेकिन बिना सोचे-समझे विश्वास करना अंधविश्वास कहलाता है। उन्होंने कहा कि वे कभी लोगों से अपनी पूजा करने के लिए नहीं कहते, बल्कि उन्हें भगवान हनुमान की भक्ति के लिए प्रेरित करते हैं। उनके अनुसार, भक्ति को अंधविश्वास कहना सही नहीं है और इसे गलत नजर से नहीं देखा जाना चाहिए।

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