रतलाम शहर में इन दिनों ठंड अपने चरम पर है। तापमान गिरने के साथ ही सबसे ज्यादा मुश्किल उन लोगों के लिए बढ़ गई है, जो रोजी-रोटी की तलाश में बाहर से आकर शहर में मजदूरी करते हैं। इनमें से कई मजदूर, बेसहारा और निर्धन लोग ऐसे हैं जिनके पास रहने के लिए कोई स्थायी ठिकाना नहीं है। दिनभर मेहनत करने के बाद ये लोग रात को बाजारों, दुकानों के बाहर, फुटपाथों या खाली स्थानों पर खुले आसमान के नीचे सोने को मजबूर हैं। न इनके पास गर्म कपड़े हैं और न ही पर्याप्त बिस्तर या कंबल। कई लोग सिर्फ पतली चादर या पुराने कपड़ों में ही ठिठुरती रात काट रहे हैं। ऐसी स्थिति में ठंड से बीमार पड़ने या जान को खतरा होने की आशंका लगातार बनी रहती है।
जानकारी के अभाव में खाली पड़े रैन बसेरे
शहर में नगर निगम और प्रशासन द्वारा जरूरतमंदों के लिए अलग-अलग स्थानों पर रैन बसेरे बनाए गए हैं। इन रैन बसेरों में ठहरने, सोने और ठंड से बचाव की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में जरूरतमंद लोग इनका लाभ नहीं ले पा रहे हैं। इसकी मुख्य वजह जानकारी का अभाव, पहचान पत्र न होना, या यह डर कि कहीं उन्हें वहां से भगा न दिया जाए। कई मजदूर बाहरी राज्यों या ग्रामीण इलाकों से आते हैं और उन्हें यह भी पता नहीं होता कि शहर में उनके लिए रैन बसेरे उपलब्ध हैं। नतीजा यह होता है कि रैन बसेरे खाली पड़े रहते हैं और लोग सड़कों पर ठंड में ठिठुरते रहते हैं। यही स्थिति जब प्रशासन के संज्ञान में आई, तो मामला गंभीर बन गया।
कलेक्टर मिशा सिंह का मानवीय कदम
जब रतलाम कलेक्टर मिशा सिंह को यह जानकारी मिली कि कड़ाके की ठंड में कई लोग खुले आसमान के नीचे रात गुजारने को मजबूर हैं और इससे उनकी तबीयत बिगड़ सकती है, तो उन्होंने बिना देर किए खुद हालात देखने का फैसला लिया। देर रात कलेक्टर मिशा सिंह शहर के अलग-अलग इलाकों में निकलीं। बाजार क्षेत्र, बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन के आसपास और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर जाकर उन्होंने खुले में सो रहे लोगों से बातचीत की। ठंड से कांप रहे लोगों की स्थिति देखकर कलेक्टर ने तुरंत अधिकारियों और कर्मचारियों को निर्देश दिए कि ऐसे सभी लोगों को रैन बसेरों तक पहुंचाया जाए। कई जगह तो खुद कलेक्टर ने लोगों को समझाया कि रैन बसेरे सुरक्षित हैं और वहां उन्हें गर्म वातावरण मिलेगा।
प्रशासन की सक्रियता से बदली रात
कलेक्टर के निर्देश के बाद प्रशासन हरकत में आया। नगर निगम, पुलिस और अन्य विभागों की टीमों ने मिलकर खुले में सो रहे लोगों को रैन बसेरों में पहुंचाया। कुछ लोगों को वाहन से ले जाया गया तो कुछ को पैदल ही नजदीकी रैन बसेरे तक पहुंचाया गया। रैन बसेरों में उन्हें सोने के लिए जगह, कंबल और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। इस पूरी कार्रवाई से न सिर्फ दर्जनों लोगों को ठंड से राहत मिली, बल्कि प्रशासन की संवेदनशीलता भी सामने आई। कलेक्टर मिशा सिंह का यह कदम शहर में चर्चा का विषय बन गया है और लोग इसे एक जिम्मेदार और मानवीय प्रशासनिक पहल के रूप में देख रहे हैं। यह घटना यह भी बताती है कि अगर प्रशासन चाहे, तो एक छोटी-सी पहल भी कई जिंदगियों को राहत दे सकती है।
