देश की सर्वोच्च अदालत ने दहेज प्रथा को लेकर बेहद कड़ी टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस विवाह को भारतीय समाज में जीवन का सबसे पवित्र बंधन माना जाता था, वह आज दहेज की वजह से व्यावसायिक सौदे में बदलता जा रहा है। अदालत ने कहा कि आधुनिक समय में लोग विवाह को उपहारों, पैसों और दिखावे के साथ जोड़ देते हैं, जिससे इस रिश्ते की आत्मा ही कमजोर हो रही है। कोर्ट ने यह भी कहा कि दहेज को चालाकी से “उपहार” या “परंपरा” बताने की कोशिश की जाती है, पर वास्तव में यह लालच की पुकार बन चुका है। अदालत के अनुसार, दहेज की मांग जितनी बढ़ती जाती है, उतना ही विवाह का उद्देश्य प्रेम और सम्मान से हटकर वित्तीय दबाव में बदल जाता है।
दहेज हत्या—एक परिवार नहीं, पूरे समाज की पीड़ा
सुप्रीम कोर्ट ने अपने बयान में इस बात पर जोर दिया कि दहेज हत्या को केवल एक घर की व्यक्तिगत घटना समझना बड़ी भूल है। जब एक नवविवाहिता को दहेज के दबाव में प्रताड़ित किया जाता है या उसकी मौत हो जाती है, तो यह घटना पूरे समाज के लिए शर्म की बात होती है। ऐसी त्रासदियां यह दिखाती हैं कि हमारी सोच आज भी पुराने दकियानूसी ढांचे में फंसी हुई है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी रूप में दहेज की मांग—चाहे कम हो या ज्यादा—महिलाओं को असुरक्षा और मानसिक अत्याचार के वातावरण में ढकेल देती है। अदालत के अनुसार, जब दहेज की वजह से हिंसा जन्म लेती है, तो यह अपराध सिर्फ कानूनी उल्लंघन नहीं, बल्कि समाजिक नैतिकता का भी हनन है।
अदालत ने कहा—कानून भी तभी असरदार जब समाज साथ दे
बेंच ने इस बात को स्वीकार किया कि देश में दहेज से जुड़े अपराधों को रोकने के लिए कड़े कानून मौजूद हैं, लेकिन जब तक समाज अपने व्यवहार और सोच में बदलाव नहीं लाएगा, तब तक इन कानूनों की प्रभावशीलता सीमित ही रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर साल हजारों मामले दर्ज होते हैं, लेकिन अभी भी अनेक महिलाएँ डर, दबाव या सामाजिक बदनामी के कारण अपनी बात सामने नहीं रख पातीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि दहेज के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस, अदालत या सरकार की नहीं, बल्कि हर परिवार और हर नागरिक की जिम्मेदारी है। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि अगर समाज दहेज की छोटी से छोटी मांग को भी स्वीकार करना बंद कर दे, तो यह बुराई धीरे-धीरे खत्म हो सकती है।
संदेश साफ—दहेज छोड़ना ही रिश्तों को बचाने का रास्ता
सुप्रीम कोर्ट के बयान का सार यही है कि दहेज की प्रथा न केवल रिश्तों को प्रदूषित करती है बल्कि महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा को भी खतरे में डालती है। अदालत का कहना है कि विवाह प्रेम, विश्वास और समानता पर आधारित होना चाहिए, न कि धन-दौलत के आदान-प्रदान पर। अदालत ने देश के युवाओं, अभिभावकों और सामाजिक संगठनों से अपील की है कि वे मिलकर दहेज के खिलाफ माहौल तैयार करें। इसके बिना न तो दहेज हत्या रुकेंगी, न महिलाओं पर अत्याचार कम होगा। अदालत का स्पष्ट संदेश है—दहेज तभी खत्म होगा, जब हम इसे “रिवाज” नहीं बल्कि “बुराई” समझकर खुले मन से इसका विरोध करेंगे।
Read more-बस्ती को मिला नया धार्मिक चमत्कार: खुला पहला नौ ग्रह मंदिर, शनि देव मंदिर बना आकर्षण का केंद्र
