बांग्लादेश की राजनीति में गुरुवार को एक अहम बदलाव हुआ। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के वरिष्ठ नेता मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर को देश का नया राष्ट्रपति चुन लिया गया है। राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव में उन्हें 255 सांसदों का समर्थन मिला। उनके सामने मैदान में उतरे ओली अहमद को 88 वोट ही हासिल हो सके। इस तरह आलमगीर ने 167 मतों के अंतर से चुनाव अपने नाम कर लिया। चुनाव में कुल 349 सांसद मतदान के लिए योग्य थे, जिनमें से 343 ने वोट डाला।
संसद में हुआ मतदान, मुख्य चुनाव आयुक्त ने किया विजेता घोषित
राष्ट्रपति पद के लिए मतदान गुरुवार दोपहर करीब 2 बजे शुरू हुआ और शाम 5 बजे तक चला। पूरी चुनाव प्रक्रिया की निगरानी मुख्य चुनाव आयुक्त एएमएम नासिर उद्दीन ने की। मतदान खत्म होने के बाद मतों की गिनती की गई और मिर्जा फखरुल आलमगीर को विजेता घोषित किया गया। उनके मुकाबले ओली अहमद को जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) के समर्थन वाले गठबंधन ने उम्मीदवार बनाया था। चुनाव में आलमगीर को मिले 255 वोटों ने उन्हें स्पष्ट बहुमत के साथ राष्ट्रपति पद तक पहुंचा दिया।
35 साल बाद राष्ट्रपति चुनाव में देखने को मिला मुकाबला
बांग्लादेश के राष्ट्रपति चुनाव की यह प्रक्रिया इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि करीब 35 साल बाद इस पद के लिए एक से ज्यादा उम्मीदवार आमने-सामने थे। इससे पहले 1991 में संसदीय मतदान के जरिए राष्ट्रपति पद के लिए मुकाबला हुआ था। इस बार BNP ने कुछ दिन पहले ही मिर्जा फखरुल को अपना उम्मीदवार घोषित किया था। नाम तय होने के बाद उन्होंने पार्टी के महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके साथ ही उन्होंने BNP की नेशनल स्टैंडिंग कमेटी से भी दूरी बना ली, ताकि राष्ट्रपति पद के चुनाव की प्रक्रिया में हिस्सा ले सकें।
BNP के वरिष्ठ नेता से राष्ट्रपति बनने तक का सफर
मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर लंबे समय से BNP की राजनीति में सक्रिय रहे हैं और पार्टी के महासचिव की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। अब राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उनके राजनीतिक जीवन में एक नया अध्याय जुड़ गया है। उनका राष्ट्रपति बनना BNP के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि पार्टी लंबे समय तक विपक्ष में रहने के बाद सत्ता में लौटी है। हालांकि बांग्लादेश में राष्ट्रपति का पद मुख्य रूप से संवैधानिक माना जाता है। देश की सरकार के वास्तविक कार्यकारी अधिकार प्रधानमंत्री और उनकी सरकार के पास होते हैं। ऐसे में आलमगीर के सामने अब संवैधानिक जिम्मेदारियों को निभाने की बड़ी भूमिका होगी।
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