जम्मू-कश्मीर से आई यह खबर हर संवेदनशील दिल को झकझोर देने वाली है। अमजद अली खान ने देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया, लेकिन उनकी शहादत की सबसे भारी कीमत उनके परिवार, खासकर उनकी नन्हीं बेटी को चुकानी पड़ी। तिरंगे में लिपटा शहीद का पार्थिव शरीर जब घर पहुंचा, तो पूरे माहौल में सन्नाटा पसर गया। उसी सन्नाटे के बीच उनकी मासूम बेटी बार-बार “पापा-पापा” पुकारती रही, यह समझे बिना कि अब उसके पिता कभी लौटकर नहीं आएंगे। यह दृश्य सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं था, बल्कि पूरे देश की आंखों को नम कर देने वाला पल बन गया।
आतंकियों से लोहा लेते हुए दी शहादत
यह घटना उधमपुर जिले के मजालता इलाके की है, जहां 15 दिसंबर को सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच भीषण मुठभेड़ हुई थी। खुफिया जानकारी के आधार पर जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों के छिपे होने की सूचना मिली थी। इसके बाद सुरक्षा बलों ने इलाके में सर्च ऑपरेशन शुरू किया। मुठभेड़ के दौरान अमजद अली खान ने बहादुरी से आतंकियों का सामना किया। इसी दौरान उन्हें गोली लगी और अत्यधिक रक्तस्राव के कारण वे वीरगति को प्राप्त हो गए। उनके साथियों ने अंत तक उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन देश के इस वीर सपूत ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपना जीवन न्योछावर कर दिया।
मासूम की पुकार ने तोड़ दिया सबका दिल
शहादत के बाद जब अमजद अली खान का पार्थिव शरीर उनके घर पहुंचा, तो वहां मौजूद हर शख्स खुद को संभाल नहीं सका। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में देखा जा सकता है कि शहीद की नन्हीं बेटी अपने पिता को पुकार रही है और उनके आसपास घूम रही है। उसे यह समझ ही नहीं आ रहा कि तिरंगे में लिपटा यह साया अब हमेशा के लिए खामोश हो चुका है। परिवार के बुजुर्ग, महिलाएं और रिश्तेदार रो-रोकर बेहाल हैं। यह दृश्य उस दर्द को बयान करता है, जिसे शब्दों में पिरो पाना मुश्किल है। देश के लिए शहादत देने वाले जवान के घर में गर्व के साथ-साथ एक ऐसा खालीपन भी है, जिसे कोई भर नहीं सकता।
देशभर से श्रद्धांजलि, बलिदान को सलाम
अमजद अली खान की शहादत की खबर सामने आते ही पूरे देश से श्रद्धांजलि संदेश आने लगे। सोशल मीडिया पर लोग उनकी बहादुरी को सलाम कर रहे हैं और परिवार के प्रति संवेदना जता रहे हैं। राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों ने एक स्वर में कहा कि देश ऐसे वीर सपूतों के बलिदान को कभी नहीं भूल सकता। सेना और प्रशासन की ओर से परिवार को हरसंभव मदद का आश्वासन दिया गया है। हालांकि, यह भी सच है कि किसी भी सहायता से उस मासूम बेटी का पिता वापस नहीं आ सकता। यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि देश की सीमाओं पर तैनात हर जवान सिर्फ एक सैनिक नहीं, बल्कि किसी का बेटा, पति और पिता भी होता है।
