Monday, February 2, 2026
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“आधी रात संसद के बाहर डाला डेरा!” जी-राम-जी बिल के खिलाफ कड़ाके की ठंड में विपक्ष का 12 घंटे का धरना

जी-राम-जी विधेयक 2025 के विरोध में विपक्षी सांसदों ने संसद परिसर में रातभर धरना दिया। मनरेगा खत्म करने के आरोप, सड़कों तक आंदोलन की चेतावनी।

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गुरुवार को संसद द्वारा ‘विकसित भारत–जी राम जी विधेयक, 2025’ पारित किए जाने के बाद देश की राजनीति में जबरदस्त हलचल देखने को मिली। विपक्षी दलों ने जी-राम-जी बिल को गरीब और मजदूर वर्ग के खिलाफ बताते हुए संसद परिसर में आधी रात से 12 घंटे का धरना शुरू कर दिया। कड़ाके की ठंड के बावजूद विपक्षी सांसद खुले आसमान के नीचे बैठ गए और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। विपक्ष का आरोप है कि यह बिल मनरेगा जैसी 20 साल पुरानी रोजगार गारंटी योजना को कमजोर करने की दिशा में बड़ा कदम है। सांसदों का कहना है कि सरकार ने बिना पर्याप्त चर्चा और संशोधन के इस विधेयक को पारित कर दिया, जिससे ग्रामीण भारत, मजदूर और गरीब परिवारों के हितों को सीधा नुकसान पहुंचेगा। इस विरोध प्रदर्शन ने संसद परिसर को पूरी रात राजनीतिक संघर्ष का केंद्र बनाए रखा।

“मनरेगा खत्म कर दिया” — टीएमसी और वाम दलों का तीखा हमला

धरने के दौरान तृणमूल कांग्रेस की सांसद सागरिका घोष ने सरकार पर बेहद गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि विपक्ष 12 घंटे का धरना इसलिए दे रहा है क्योंकि सरकार ने मनरेगा को खत्म कर दिया है और इसके जरिए महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर का अपमान किया गया है। सागरिका घोष ने कहा कि मनरेगा देश के गरीबों के लिए एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम था, जिसने संकट के समय लाखों परिवारों को सहारा दिया, लेकिन अब इसे खत्म कर दिया गया है। वहीं सीपीआई सांसद पी. संतोष कुमार ने इस बिल को “गरीबों और मजदूरों पर बम गिराने जैसा” बताया। उन्होंने कहा कि यह बीजेपी की ओर से नए साल का ऐसा तोहफा है, जो आम जनता के लिए विनाशकारी साबित होगा। संतोष कुमार ने साफ चेतावनी दी कि विपक्ष ने सत्र का बहिष्कार किया है और आने वाले दिनों में यह विरोध संसद से निकलकर सड़कों तक जाएगा।

अभिषेक मनु सिंघवी बोले—“यह बिल अहंकार का प्रतीक”

कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने जी-राम-जी बिल को सरकार के अहंकार का प्रतीक करार दिया। उन्होंने कहा कि विपक्ष की मांग बहुत मामूली थी कि इस बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाए ताकि उस पर विस्तार से चर्चा और संशोधन हो सके। सिंघवी के मुताबिक यह कोई असामान्य या असंवैधानिक मांग नहीं थी, लेकिन सरकार ने इसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस योजना में इतनी पाबंदियां जोड़ दी गई हैं कि इसका मूल उद्देश्य ही खत्म हो गया है। कांग्रेस का कहना है कि यह विधेयक रोजगार गारंटी की भावना को कमजोर करता है और केंद्र सरकार को अत्यधिक नियंत्रण देता है, जिससे राज्यों और पंचायतों की भूमिका सीमित हो जाएगी। विपक्ष के अनुसार यह न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का अपमान है, बल्कि गरीबों के अधिकारों पर भी सीधा हमला है।

“गरीब को और गरीब बनाने की कोशिश” — कांग्रेस का बड़ा आरोप

कांग्रेस सांसद रंजीत रंजन ने कहा कि विपक्ष ने मनरेगा से जुड़ी चर्चा में पूरी गंभीरता से भाग लिया और दोनों सदनों में बार-बार मांग की कि इस बिल को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा जाए। उनके मुताबिक इस विधेयक में कई ऐसे प्रावधान हैं, जिनमें बड़े संशोधन की जरूरत है। रंजीत रंजन ने आरोप लगाया कि सरकार गरीब को और गरीब बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि सरकार क्यों 60 दिन के रोजगार को खत्म करना चाहती है और क्यों धीरे-धीरे मनरेगा को समाप्त करने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कहा कि मनरेगा के कारण मजदूरों को बेहतर मजदूरी मिल रही थी, लेकिन अब उन्हें दोबारा असुरक्षित और ब्लैकमेल करने की स्थिति पैदा की जा रही है। कांग्रेस सांसद ने साफ कहा कि सरकार को यह बिल वापस लेना होगा, क्योंकि यह देश के गरीब और मजदूर वर्ग के हितों के खिलाफ है। विपक्ष का कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि जनता के बीच जाकर इसे और तेज किया जाएगा।

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