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‘6 महीने में आरक्षण दिलाओ या कुर्सी छोड़ो!’ मुकेश सहनी ने किसे दिया 6 महीने का अल्टीमेटम?

VIP प्रमुख मुकेश सहनी ने यूपी में ‘आरक्षण नहीं तो वोट नहीं’ का नारा देते हुए निषाद समाज के लिए आरक्षण की मांग तेज कर दी है। उन्होंने मंत्री संजय निषाद को 6 महीने का अल्टीमेटम भी दिया।

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उत्तर प्रदेश में निषाद समाज के आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक चर्चा का केंद्र बन गया है। विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रमुख और बिहार के पूर्व मंत्री मुकेश सहनी ने प्रदेश में बड़ा ऐलान करते हुए कहा है कि अब निषाद समाज अपने अधिकारों के लिए निर्णायक लड़ाई लड़ेगा। पूर्वांचल के दौरे पर पहुंचे सहनी ने कार्यकर्ताओं और समाज के लोगों को संबोधित करते हुए ‘आरक्षण नहीं तो वोट नहीं’ का नारा दिया। उन्होंने कहा कि वर्षों से आरक्षण की मांग उठाई जा रही है, लेकिन अब तक इसका कोई स्थायी समाधान नहीं निकला है। इसी वजह से समाज के लोग अब अपनी ताकत दिखाने की तैयारी कर रहे हैं। उनके इस बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है।

पूरे यूपी में निकलेगी संकल्प यात्रा

मुकेश सहनी ने कहा कि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में एक बड़ी संकल्प यात्रा निकाली जाएगी। इस यात्रा का मकसद निषाद समाज को एकजुट करना और आरक्षण की मांग को मजबूत करना होगा। उन्होंने दावा किया कि प्रदेश में निषाद समाज की आबादी काफी बड़ी है और चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। सहनी ने कहा कि समाज के लोग गंगाजल हाथ में लेकर यह संकल्प लेंगे कि जब तक आरक्षण नहीं मिलेगा, तब तक वे अपने अधिकारों की लड़ाई जारी रखेंगे। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि समाज को उसका हक दिलाने के लिए है। उनके इस ऐलान को आगामी विधानसभा चुनावों से पहले बड़े राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

संजय निषाद पर सीधा हमला

अपने भाषण के दौरान मुकेश सहनी ने उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री डॉ. संजय निषाद पर भी खुलकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि निषाद समाज ने संघर्ष करके नेताओं को आगे बढ़ाया, लेकिन आज समाज के मूल मुद्दे पीछे छूट गए हैं। सहनी ने आरोप लगाया कि सत्ता में पहुंचने के बाद आरक्षण की लड़ाई कमजोर पड़ गई है। उन्होंने कहा कि अगर अगले छह महीने के भीतर निषाद समाज को आरक्षण दिलाने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठता है, तो समाज खुद इसका जवाब देगा। सहनी ने यह भी कहा कि यदि कोई नेता समाज के हितों के लिए आवाज नहीं उठा सकता, तो उसे पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। उनके इस बयान ने राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है।

चुनाव से पहले बढ़ सकती है सियासी चुनौती

मुकेश सहनी ने अपने संबोधन में जातीय जनगणना और आबादी के अनुसार हिस्सेदारी का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि समाज अब पहले की तुलना में ज्यादा जागरूक है और अपने अधिकारों के लिए संगठित हो रहा है। सहनी का दावा है कि यदि चुनाव से पहले आरक्षण को लेकर कोई फैसला नहीं लिया गया, तो इसका असर राजनीतिक रूप से देखने को मिल सकता है। उन्होंने कहा कि निषाद समाज अब सिर्फ वादों पर भरोसा नहीं करेगा, बल्कि नतीजे देखना चाहता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पूर्वांचल में निषाद समाज का प्रभाव कई सीटों पर है, इसलिए यह मुद्दा आने वाले चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। फिलहाल, मुकेश सहनी के इस बयान ने यूपी की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है और सभी दल इस पर नजर बनाए हुए हैं।

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