पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों के बाद सियासी माहौल लगातार गर्म बना हुआ है और अब इस पर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के बयान ने नई बहस छेड़ दी है। एक टीवी इंटरव्यू के दौरान उन्होंने साफ कहा कि अगर ममता बनर्जी इस्तीफा नहीं देती हैं, तो उन्हें बर्खास्त किया जा सकता है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब राज्य में सत्ता परिवर्तन की चर्चा तेज है। सरमा ने यह भी जोड़ा कि लोकतंत्र किसी एक नेता की इच्छा से नहीं चलता और संवैधानिक प्रक्रिया का पालन हर हाल में होना चाहिए। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल और तेज हो गई है।
“लोकतंत्र नियमों से चलता है, आरोपों से नहीं”
इंटरव्यू के दौरान हिमंता बिस्वा सरमा ने ममता बनर्जी द्वारा लगाए गए चुनावी धांधली के आरोपों पर भी तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि अगर हर नेता हार के बाद सीटें छिनने का आरोप लगाने लगे, तो देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर हो जाएगी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि वे भी अपने राज्य में इसी तरह के आरोप लगा सकते हैं, लेकिन इससे कोई समाधान नहीं निकलता। सरमा के अनुसार, चुनाव आयोग और संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा रखना जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में हार और जीत दोनों को स्वीकार करना ही परिपक्व राजनीति की पहचान होती है।
राज्यपाल की भूमिका पर दिया संकेत
हिमंता बिस्वा सरमा ने अपने बयान में यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में राज्यपाल की भूमिका अहम हो जाती है। उन्होंने कहा कि राज्यपाल एक निश्चित समय तक ही इंतजार कर सकते हैं और उसके बाद संवैधानिक कदम उठाए जा सकते हैं। उनका इशारा इस ओर था कि अगर मौजूदा मुख्यमंत्री इस्तीफा देने में देरी करते हैं, तो राज्यपाल उन्हें बहुमत साबित करने के लिए कह सकते हैं या फिर सीधे कार्रवाई भी कर सकते हैं। यह बयान उस संवैधानिक व्यवस्था की ओर इशारा करता है, जहां राज्यपाल को सरकार की वैधता सुनिश्चित करने का अधिकार होता है। इससे यह भी साफ होता है कि आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति में घटनाक्रम तेजी से बदल सकता है।
बयानबाजी से और बढ़ सकता है टकराव
हिमंता बिस्वा सरमा के इस कड़े बयान के बाद राजनीतिक माहौल और ज्यादा तनावपूर्ण हो सकता है। एक तरफ जहां भाजपा इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रही है, वहीं दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस इसे राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश बता सकती है। इस तरह की बयानबाजी से दोनों दलों के बीच टकराव और बढ़ सकता है। हालांकि, अंतिम फैसला संवैधानिक प्रक्रिया के तहत ही होगा और राज्यपाल की भूमिका इसमें निर्णायक साबित हो सकती है। फिलहाल सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि आगे क्या कदम उठाए जाते हैं और क्या स्थिति शांतिपूर्ण तरीके से सुलझ पाती है या नहीं।
