सावन के पवित्र महीने में देशभर से कांवड़ यात्रा की तस्वीरें सामने आ रही हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के मेरठ से आई एक तस्वीर ने लोगों का दिल जीत लिया है। जहां अक्सर सास-बहू के रिश्तों को लेकर विवादों की खबरें सुर्खियों में रहती हैं, वहीं इस बार एक बहू ने अपनी सेवा और सम्मान से समाज के सामने नई मिसाल पेश की है। मेरठ की रहने वाली आरती ने अपनी बुजुर्ग सास उषा को कांवड़ में बैठाकर अपने कंधों पर उठाया और हरिद्वार से गंगाजल लेकर लौटते समय पूरी यात्रा कराई। यह दृश्य जिसने भी देखा, वह भावुक हो गया। सोशल मीडिया पर भी इस तस्वीर की जमकर चर्चा हो रही है और लोग बहू की भावना की खुलकर सराहना कर रहे हैं।
सास को दिया मां का सम्मान
जानकारी के अनुसार, आरती अपने परिवार के साथ हरिद्वार से गंगाजल लेकर लौट रही थीं। उनकी बुजुर्ग सास लंबी पैदल यात्रा करने की स्थिति में नहीं थीं। ऐसे में आरती ने उन्हें कांवड़ में बैठाया और पूरे रास्ते अपने कंधों पर उठाकर यात्रा जारी रखी। इस दौरान उनके चेहरे पर थकान से ज्यादा श्रद्धा और सेवा का भाव दिखाई दिया। राह में मौजूद श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों ने भी इस दृश्य को देखकर उनकी हौसला अफजाई की। कई लोगों ने कहा कि आज के समय में ऐसा समर्पण और अपनापन बहुत कम देखने को मिलता है। आरती ने अपने व्यवहार से यह संदेश दिया कि परिवार के बुजुर्गों का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि सेवा से भी किया जा सकता है।
सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीर
जैसे ही इस अनोखी कांवड़ यात्रा की तस्वीर सोशल मीडिया पर पहुंची, लोगों ने इसे तेजी से साझा करना शुरू कर दिया। हजारों यूजर्स ने बहू की तारीफ करते हुए इसे भारतीय संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों की शानदार मिसाल बताया। कई लोगों ने आरती की तुलना श्रवण कुमार से करते हुए कहा कि जिस तरह उन्होंने अपने माता-पिता की सेवा की थी, उसी तरह इस बहू ने अपनी सास के प्रति सम्मान और जिम्मेदारी निभाई है। इंटरनेट पर लोगों का कहना है कि ऐसी घटनाएं समाज में सकारात्मक संदेश देती हैं और रिश्तों में प्रेम, विश्वास और सम्मान को मजबूत करती हैं।
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कांवड़ यात्रा सिर्फ आस्था नहीं, सेवा का भी संदेश देती है
सावन के महीने में होने वाली कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं मानी जाती, बल्कि यह सेवा, त्याग और समर्पण का संदेश भी देती है। उत्तराखंड के हरिद्वार, गंगोत्री और गोमुख सहित कई पवित्र स्थानों से श्रद्धालु गंगाजल लेकर अपने-अपने शिवालयों तक पहुंचते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और ओडिशा में इस यात्रा को ‘बोल बम यात्रा’ के नाम से भी जाना जाता है। मेरठ की आरती ने अपनी सास को कंधों पर बैठाकर यह साबित कर दिया कि सच्ची भक्ति केवल पूजा-पाठ में नहीं, बल्कि अपने परिवार और बुजुर्गों की सेवा में भी होती है। उनकी यह पहल लोगों के लिए प्रेरणा बन गई है और सावन के इस पावन अवसर पर मानवता, सम्मान और रिश्तों की खूबसूरत मिसाल पेश कर रही है।
