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“हर सुबह आखिरी हो सकती है” बांग्लादेशी हिंदुओं में कट्टरपंथियों का खौफ, नाम छुपाकर जीने को मजबूर

Bangladesh Hindu Crisis: बांग्लादेश में हिंदुओं पर बढ़ते हमलों के बीच डर का माहौल है। दीपू दास की हत्या के बाद अल्पसंख्यक खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। जानिए जमीनी हकीकत।

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बांग्लादेशी हिंदू समुदाय इन दिनों जिस हालात से गुजर रहा है, वह किसी भयावह सपने से कम नहीं है। हाल के महीनों में हुई हिंसक घटनाओं के बाद अल्पसंख्यक समुदाय के लोग न सिर्फ बोलने से डर रहे हैं, बल्कि अपनी पहचान तक छुपाने को मजबूर हैं। बांग्लादेशी हिंदुओं ने मीडिया से बात करते हुए साफ कहा कि अगर उसने अपना नाम या चेहरा उजागर किया, या उसकी आवाज पहचान ली गई, तो अगली सुबह शायद उसकी आखिरी सुबह हो सकती है। उसका कहना है कि वह और उसके जैसे हजारों लोग “जिंदा तो हैं, लेकिन चलती-फिरती लाशों की तरह जी रहे हैं।” यह डर अचानक पैदा नहीं हुआ, बल्कि लगातार हो रही घटनाओं ने हिंदुओं के मन में यह डर बैठा दिया है कि वे कभी भी निशाना बन सकते हैं।

दीपू दास की हत्या ने बढ़ाया खौफ

इस डर की सबसे बड़ी वजह 25 वर्षीय हिंदू मजदूर दीपू दास की निर्मम हत्या है, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। 18 दिसंबर को मयमनसिंह शहर में कपड़ा कारखाने में काम करने वाले दीपू दास पर कथित तौर पर ईशनिंदा का आरोप लगाया गया और भीड़ ने पीट-पीटकर उसकी जान ले ली। इतना ही नहीं, हत्या के बाद उसके शव को आग के हवाले कर दिया गया। इस घटना ने यह संदेश दे दिया कि आरोप सही है या गलत, इसकी जांच से पहले ही भीड़ कानून अपने हाथ में लेने को तैयार है। हालांकि बांग्लादेश की रैपिड एक्शन बटालियन ने साफ किया है कि अब तक ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला है जिससे यह साबित हो कि दीपू दास ने कोई आपत्तिजनक पोस्ट की थी। इसके बावजूद उसकी जान चली गई, और यही बात बांग्लादेशी हिंदुओं के भीतर डर को और गहरा कर रही है।

सत्ता परिवर्तन के बाद बढ़ी कट्टरपंथी हिंसा

शेख हसीना के तख्तापलट के बाद बांग्लादेश में हालात तेजी से बदले हैं। कट्टरपंथी समूहों को कथित तौर पर खुली छूट मिलने से हालात और बिगड़ते चले गए। छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद देश के कई हिस्सों में हिंसा भड़क उठी, जिसका असर दूर-दराज के इलाकों तक देखने को मिला। हिंदू घरों, दुकानों और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया जाने लगा। अल्पसंख्यकों का कहना है कि मौजूदा शासन व्यवस्था में उनकी आवाज दबाई जा रही है और सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। कई लोग अपने घर छोड़ने पर मजबूर हो चुके हैं, जबकि जो वहीं रह रहे हैं, वे हर पल डर के साये में जी रहे हैं। नाम न बताने वाले युवक ने कहा कि “हम बोलना चाहते हैं, लेकिन बोलेंगे तो मारे जाएंगे।”

सरकार का आश्वासन, लेकिन भरोसा डगमगाया

दीपू दास की हत्या के बाद अंतरिम सरकार ने पीड़ित परिवार की जिम्मेदारी लेने की बात कही है। शिक्षा सलाहकार सी आर अबरार ने खुद दीपू दास के परिजनों से मुलाकात कर कहा कि सरकार उसके बच्चे, पत्नी और माता-पिता की देखभाल करेगी। उन्होंने इस हत्या को “क्रूर अपराध” बताया और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन दिया। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि केवल बयान और आश्वासन से डर खत्म नहीं हो रहा। बांग्लादेशी हिंदुओं का कहना है कि जब तक दोषियों को सख्त सजा नहीं मिलती और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक हालात नहीं बदलेंगे। आज बांग्लादेश में हजारों हिंदू ऐसे हैं, जो हर सुबह यह सोचकर आंख खोलते हैं कि कहीं यह उनकी आखिरी सुबह न हो।

 

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