उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से सामने आई यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है। शालीमार गार्डन इलाके में हिंदू रक्षा दल नामक संगठन ने खुलेआम एक कार्यक्रम आयोजित कर हिंदू समुदाय के लोगों के बीच तलवारें और फरसे बांटे। यह कार्यक्रम किसी बंद हॉल या निजी परिसर में नहीं, बल्कि सार्वजनिक जगह पर हुआ, जहां बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। कार्यक्रम के दौरान न सिर्फ हथियार बांटे गए, बल्कि तलवारबाजी का प्रदर्शन भी किया गया और तेज़ आवाज़ में धार्मिक नारे लगाए गए। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस दौरान सड़क पर आवाजाही भी प्रभावित हुई, लेकिन कहीं भी पुलिस की सक्रिय मौजूदगी दिखाई नहीं दी। इस आयोजन के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि सार्वजनिक स्थान पर हथियारों के इस तरह के प्रदर्शन की अनुमति किसने दी और क्या इसके लिए प्रशासन से कोई लिखित इजाजत ली गई थी।
पिंकी चौधरी की मौजूदगी और संगठन का दावा
इस कार्यक्रम की अगुवाई हिंदू रक्षा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष पिंकी चौधरी ने की। शालीमार गार्डन स्थित अपने कार्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम में उन्होंने समर्थकों को तलवारें और फरसे सौंपे। संगठन से जुड़े अमित प्रजापति ने दावा किया कि यह कदम हिंदुओं की “आत्मरक्षा” के लिए उठाया गया है। मंच से दिए गए बयानों में कहा गया कि लोगों को अपने घरों में शस्त्र रखने चाहिए और उन्हें चलाना सीखना चाहिए। कार्यक्रम के दौरान दूसरे समुदाय को लेकर की गई टिप्पणियों को कई लोगों ने आपत्तिजनक बताया। दिलचस्प बात यह भी है कि ऐसा ही एक कार्यक्रम ठीक एक दिन पहले दिल्ली के नंद नगरी इलाके में भी आयोजित किया गया था, जहां इसी तरह तलवारें बांटी गई थीं। लगातार दो शहरों में हुए इन आयोजनों ने कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
हथियार प्रशिक्षण की मांग और बयानबाजी से बढ़ा विवाद
कार्यक्रम के दौरान अमित प्रजापति ने सरकार से लोगों को हथियार चलाने की ट्रेनिंग देने की अनुमति देने की मांग भी की। अपने भाषण में उन्होंने कहा कि किसी भी संकट की स्थिति में सरकार या संगठन बाद में आता है, पहले व्यक्ति को खुद मजबूत होना पड़ता है। उन्होंने बांग्लादेश जैसी स्थिति का हवाला देते हुए लोगों से खुद पर निर्भर रहने की अपील की। इस बयानबाजी के बाद सोशल मीडिया पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई लोगों ने इसे समाज में डर और तनाव फैलाने वाला कदम बताया, जबकि कुछ समर्थकों ने इसे आत्मरक्षा का अधिकार करार दिया। हालांकि, जानकारों का मानना है कि सार्वजनिक रूप से हथियार बांटना और इस तरह के बयान देना कानून की सीमाओं को चुनौती देता है और इससे सामाजिक सौहार्द बिगड़ने का खतरा बढ़ जाता है।
प्रशासन की चुप्पी और कानून-व्यवस्था पर सवाल
इस पूरे मामले के बाद सबसे अहम सवाल प्रशासन की भूमिका को लेकर उठ रहा है। गाजियाबाद जैसे संवेदनशील और घनी आबादी वाले इलाके में खुलेआम हथियारों का वितरण कैसे हुआ, यह अब तक साफ नहीं हो पाया है। क्या पुलिस को पहले से इसकी जानकारी थी, और अगर थी तो इसे रोका क्यों नहीं गया—इन सवालों के जवाब अब भी नहीं मिले हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि अगर किसी अन्य समूह द्वारा इस तरह का कार्यक्रम किया जाता, तो शायद तुरंत कार्रवाई होती। फिलहाल प्रशासन की ओर से कोई ठोस बयान सामने नहीं आया है, लेकिन इस घटना ने यह बहस जरूर छेड़ दी है कि सार्वजनिक सुरक्षा, कानून और अभिव्यक्ति की सीमाएं आखिर कहां तय की जानी चाहिए।
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