प्रयागराज में पौष पूर्णिमा से शुरू हुआ माघ मेला इन दिनों श्रद्धा, भक्ति और सनातन परंपराओं का जीवंत उदाहरण बना हुआ है। संगम तट पर दूर-दूर से आए लाखों श्रद्धालु पुण्य स्नान कर रहे हैं और साधु-संतों के पंडालों में भजन-कीर्तन से पूरा मेला क्षेत्र गुंजायमान है। इसी विशाल धार्मिक आयोजन के बीच संगम की रेती पर एक ऐसा दृश्य है, जो हर आने वाले को ठहरकर सोचने पर मजबूर कर देता है। माघ मेला क्षेत्र के सेक्टर पांच, झूसी पुल के पास स्थित देवरहा बाबा का पंडाल इन दिनों विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहां 50 फीट ऊंचे लोहे के स्तंभ पर जल रही अखंड ज्योति न केवल श्रद्धालुओं की आस्था को मजबूत करती है, बल्कि इसके पीछे छिपे रहस्य को लेकर जिज्ञासा भी पैदा करती है। माघ मेला या महाकुंभ समाप्त होने के बाद जहां बाकी पंडाल हटा दिए जाते हैं, वहीं देवरहा बाबा का यह शिविर पूरे साल बसा रहता है और अखंड ज्योति निरंतर प्रज्वलित रहती है।
20 साल से नहीं बुझी लौ, तूफान और बाढ़ भी नहीं कर सकी असर
देवरहा बाबा के पंडाल में जल रही यह अखंड ज्योति पिछले करीब 20 वर्षों से अनवरत जल रही है। खास बात यह है कि यह ज्योति जमीन पर नहीं, बल्कि लगभग 50 फीट ऊंचे लोहे के स्तंभ पर स्थापित है। इस स्तंभ पर ऐसा विशेष ढांचा तैयार किया गया है कि तेज हवा, आंधी या तूफान भी इसकी लौ को बुझा नहीं पाते। हर साल संगम क्षेत्र में आने वाली बाढ़ भी इस अखंड ज्योति को प्रभावित नहीं कर सकी है। बाढ़ के दौरान जब चारों ओर पानी भर जाता है, तब भी नाव के जरिए यहां पहुंचकर ज्योति की सेवा की जाती है। अखंड ज्योति तक पहुंचने के लिए लोहे की मजबूत सीढ़ियां बनाई गई हैं, ताकि सेवा में कोई बाधा न आए। मान्यता है कि यह ज्योति मानव कल्याण, सुख-समृद्धि और सनातन संस्कृति की निरंतरता के लिए जलाई गई है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस ज्योति के दर्शन मात्र से मन को शांति और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
देवरहा बाबा का रहस्यमय जीवन
इस अखंड ज्योति का संबंध प्रसिद्ध संत देवरहा बाबा से जुड़ा हुआ है, जिनका जीवन स्वयं रहस्यों से भरा रहा है। स्वर्गीय देवरहा बाबा जमीन से कुछ ऊंचाई पर बने मचान पर रहते थे और साधना करते थे। जब भक्त उनसे आशीर्वाद लेने आते थे, तो वे अपने चरण उनके सिर पर रखकर आशीष देते थे, जिसे लोग अद्भुत और दिव्य अनुभव बताते हैं। कहा जाता है कि देवरहा बाबा 150 वर्षों से भी अधिक समय तक जीवित रहे। माघ मेला क्षेत्र में उनके पंडाल में आज भी उनकी स्मृति में एक ऊंची कुटिया बनी हुई है, जिसमें उनकी तस्वीर स्थापित है। इसी कुटिया के ऊपर अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है। देवरहा बाबा का यह स्थान इसलिए भी विशेष माना जाता है क्योंकि यहीं बैठकर उन्होंने साधना की और अनगिनत श्रद्धालुओं को मार्गदर्शन दिया। उनके शिष्य महंत रामदास महाराज आज भी इस पंडाल की सेवा-संभाल कर रहे हैं और बाबा की परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं।
राम मंदिर की भविष्यवाणी से लेकर सनातन संस्कृति तक का संदेश
देवरहा बाबा का नाम सिर्फ आध्यात्मिक चमत्कारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने सामाजिक और धार्मिक आंदोलनों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फरवरी 1989 में संगम किनारे लगे कुंभ मेले के दौरान उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह घोषणा की थी कि अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर बनेगा। इसी घोषणा के बाद उन्होंने राम मंदिर आंदोलन का समर्थन किया था, जिसे आज भी उनके अनुयायी याद करते हैं। वर्तमान में संगम की रेती पर सेक्टर पांच में स्थित देवरहा बाबा का यह शिविर स्वामी रामदास जी महाराज द्वारा संचालित किया जा रहा है। पहले वर्षों में अखंड ज्योति लकड़ी के स्तंभ पर जलाई जाती थी, लेकिन 2025 में एक श्रद्धालु द्वारा लोहे के स्थायी लौ स्तंभ की स्थापना करवाई गई। माना जाता है कि यह अखंड ज्योति सनातन संस्कृति के नित्य उन्नयन और समाज में सकारात्मक चेतना बनाए रखने का प्रतीक है। माघ मेले में आने वाले श्रद्धालु इस ज्योति को देखकर न केवल श्रद्धा से नतमस्तक होते हैं, बल्कि इसके पीछे छिपे आध्यात्मिक रहस्य को महसूस कर अपने साथ एक अलग अनुभूति लेकर लौटते हैं।
