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‘रोको-टोको या ठोको?’ शंकराचार्य के नए ऐलान से मचा बवाल, क्या करने जा रही फरसा वाली ‘चतुरंगिणी सेना’?

वाराणसी में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने ‘चतुरंगिणी सेना’ का गठन किया और ‘रोको, टोको और ठोको’ का नारा दिया। जानें इस पहल का उद्देश्य, रणनीति और विवाद की पूरी कहानी।

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वाराणसी से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने धार्मिक और सामाजिक दोनों ही क्षेत्रों में चर्चा तेज कर दी है। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने ‘चतुरंगिणी सेना’ नाम से एक नए संगठन के गठन की घोषणा की है। इस पहल के साथ उन्होंने ‘रोको, टोको और ठोको’ का नारा दिया, जिसने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। बताया जा रहा है कि इस सेना की शुरुआत एक सीमित टीम के साथ की गई है, लेकिन इसे धीरे-धीरे बड़े स्तर पर विस्तार देने की योजना है। इस संगठन का उद्देश्य समाज में जागरूकता बढ़ाना और धार्मिक प्रतीकों की रक्षा करना बताया गया है। खास बात यह है कि यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब समाज में सुरक्षा और पहचान को लेकर बहस लगातार तेज हो रही है।

क्या है ‘रोको, टोको और ठोको’ का असली मतलब?

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा ‘रोको, टोको और ठोको’ नारे को लेकर हो रही है। पहली नजर में यह नारा आक्रामक लग सकता है, लेकिन शंकराचार्य ने इसके पीछे का मतलब स्पष्ट किया है। उनके अनुसार, ‘रोको’ का अर्थ है किसी भी गलत या अवैध गतिविधि को रोकना, ‘टोको’ का मतलब है उसे समझाना और सही रास्ते पर लाने की कोशिश करना, जबकि ‘ठोको’ का अर्थ कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई सुनिश्चित करना है। उन्होंने यह भी कहा कि इस नारे को गलत तरीके से नहीं समझा जाना चाहिए, क्योंकि इसका उद्देश्य हिंसा फैलाना नहीं बल्कि अनुशासन और जिम्मेदारी का भाव पैदा करना है। इस स्पष्टीकरण के बावजूद, ‘चतुरंगिणी सेना’ का यह नारा लोगों के बीच बहस का विषय बना हुआ है।

फरसा लेकर तैनात रहेंगे सदस्य

‘चतुरंगिणी सेना’ की एक और खास बात यह है कि इसके सदस्य पारंपरिक हथियार ‘फरसा’ के साथ दिखाई देंगे। इसे लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं, लेकिन शंकराचार्य ने साफ किया है कि यह केवल प्रतीकात्मक होगा। उनका कहना है कि भारतीय परंपरा में शस्त्र केवल सुरक्षा और सम्मान के प्रतीक रहे हैं, न कि आक्रमण के। उन्होंने जोर देकर कहा कि संगठन का मकसद किसी तरह की हिंसा करना नहीं है, बल्कि समाज में आत्मविश्वास और सुरक्षा की भावना को मजबूत करना है। संगठन के सदस्य अनुशासन के साथ काम करेंगे और किसी भी स्थिति में कानून से बाहर जाकर कोई कदम नहीं उठाएंगे। इस बयान के बाद भी इस पहल को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

आगे की रणनीति और बड़ा लक्ष्य

बताया जा रहा है कि ‘चतुरंगिणी सेना’ को एक संगठित ढांचे में तैयार किया जाएगा, जिसमें अलग-अलग विभाग बनाए जाएंगे। इसमें बौद्धिक, सामाजिक, सुरक्षा और सेवा से जुड़े कई हिस्से शामिल होंगे। आने वाले महीनों में इसके विस्तार, प्रशिक्षण और सदस्यता अभियान पर काम किया जाएगा। लक्ष्य है कि अधिक से अधिक लोगों को इस संगठन से जोड़ा जाए और एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया जाए। यह पहल न केवल वाराणसी बल्कि अन्य राज्यों में भी फैल सकती है। हालांकि, इस पूरे अभियान को लेकर प्रशासन और समाज की नजर बनी हुई है कि यह किस दिशा में आगे बढ़ता है और इसका वास्तविक प्रभाव क्या होगा।

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